पत्रकारिता का स्तर निम्न ही नहीं, भयावह और शर्मनाक भी है

विजय कुमार–

कई साल पहले एक फिल्म आई थी ‘पेज थ्री’! पत्रकारिता जगत की रंगीनियों, भ्रष्ट नेताओं से हाई लेवल के पत्रकारों की सांठ-गांठ और पत्रकारिता के क्षेत्र मे शीर्ष स्तर पर फैले भ्रष्टाचार को उजागर करती इस फिल्म को दर्शकों ने खूब सराहा था। उस समय तक भी पत्रकारिता का स्तर उतना निम्न नही था, जितना भयावह और शर्मनाक अब हो चुका है। राजनीति की भांति पत्रकारिता भी शनै:-शनै: समाजसेवा एवं समाज की आवाज़ बनने के उद्देश्य से पथभ्रष्ट होते हुए पूर्ण रूप से व्यवसाय मे परिवर्तित हो चुकी है। जब कोई क्षेत्र नब्बे फीसदी तक भ्रष्ट हो चुका हो तो शेष दस प्रतिशत का कोई मायने नही रह जाता और मात्र दस प्रतिशत भाग की वजह से समाज मे सम्मान की दृष्टि से उसे मान्यता मिलना संभव नही रह जाता है।

पत्रकारिता, बढ़ती बेरोजगारी के बीच कम पढ़े-लिखे युवाओं से लेकर शिक्षित युवाओं तक के लिए बिना लागत वाला पेशा एवं अनैतिक कृत्यों के संरक्षण का माध्यम बन चुकी है। अब वे पत्रकार न के बराबर ही दिखेंगे जो फटे-पुराने कपड़ों और तंगहाल जीवन गुजारा करने को तत्पर रहते थे, परंतु अपनी कलम से समझौता हरगिज़ नही कर सकते थे। अब तो बाइकों पर फर्राटा भरते हुए अवैध कमाई की तलाश करते दलाल ही हर तरफ दिखते हैं।

पत्रकारिता भ्रष्टाचारियों, समाज मे अवैध कृत्यों को अंजाम देने वालों, भ्रष्ट राजनेताओं और भ्रष्ट कालेकारोबारियों के कारनामों को उजागर करने के बजाए उन्हे ढ़कने के लिए उनसे अवैध कमाई करने का ज़रिया बन चुकी है। बड़े और नामी-गिरामी बैनरों की स्थिति तो और भी भयावह है उनके गली-मोहल्ले तक के एजेंट केवल यही धंधा करते देखे जा सकते हैं। ऐसा नही कि इस अवैध कमाई को ये एजेंट अकेले चट कर जाते हैं बल्कि उन्हे भी उसमे से अपने ऊपर के लोगों पर खर्च करके खुश रखना पड़ता है।

पत्रकारिता जो कभी उच्चस्तरीय सम्मानित शौक माना जाता था और समाज मे पत्रकारों को अति सम्मान की दृष्टि से देखा जाता था, पत्रकारों को आमजन आदर भाव देते थे उनकी प्रशंसा होती थी, आज स्थिति ये हो चुकी कि अब तो जूतम-पैजार भी होती रहती है।

पत्रकारिता जगत की इस अफसोसजनक स्थिति का मुख्य कारण यही है कि पत्रकारिता सिद्धांतों से विमुख होकर समाज मे एक अपमानजनक अवैध पेशा का रूप लेती जा रही है। आज बड़े-बड़े बैनरों को समाज का अहित करने वाली तमाम बुराईयों से वाकिफ होते हुए भी रंग-बिरंगे नोटों की गड्डी के दम पर आंखों पर हमेशा पट्टी चढ़ाए हुए अनैतिक कृत्यों को अंजाम देने वाले समाज के सबसे निम्न वर्ग जिनमे भ्रष्टाचारी नेताओं, जनप्रतिनिधियों, नौकरशाहों, काले कारोबारियों, अनैतिक कृत्यों के संवाहकों, विभिन्न प्रकार के माफियाओं के पत्तल चाटते हुए और उनकी मिथ्या प्रशंसा मे अपनी लेखनी को शर्मशार करते हुए देखता हूं तो पत्रकारिता के इस बेहद घटिया स्तर पर अत्यंत दु:ख होता है।