भारत में रंगभेद/जातिभेद कहाँ और क्यों ?

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
(प्रख्यात भाषाविद्-समीक्षक)

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय


हम कितने अज्ञानी हैं, जो ‘सवर्ण’ को मात्र कतिपय जातियों तक सीमित करके देखते हैं। पहले की व्यवस्था को वर्तमान सामाजिक व्यवस्था के परिप्रेक्ष्य में यदि देखा जाये तो आज की तुलना में पूर्व की सामाजिक व्यवस्था अत्युत्तम और सर्वकल्याणकारी थी; कहीं कोई विभेद नहीं था। हमारे तत्त्वदर्शी पूर्वजवृन्द असमानता के पक्षधर कदापि नहीं थे।
कैसे?
आइए! समझते हैं :—-
भारतीय समाज में दो व्यवस्था सम्यक् दृष्टि की परिचायिका हैं : पहली, ‘वर्ण-व्यवस्था’ और दूसरी, ‘आश्रम-व्यवस्था’।
अब आप इन्हें ध्यानपूर्वक समझने का प्रयास करें। हमारे यहाँ चार प्रकार की ‘वर्ण-व्यवस्था’ रही है : १- ब्राह्मण २- क्षत्रिय ३- वैश्य ४- शूद्र।
आश्चर्य है, वरीयताक्रम में तीन को तो सभी समझते हैं, परन्तु चौथे को अपने-अपने ढंग से समझने-समझानेवाले लोग चार प्रकार के हैं :– पहला, समझता है; दूसरा, समझकर भी नहीं समझता है; तीसरा, समाज के अतिरिक्त समझदार लोग जो भी समझा देते हैं, समझ लेता है तथा चौथा, समझना ही नहीं चाहता।
उपर्युक्त चार वर्ण की जब भारतीय समाज में व्यवस्था है तब ‘सवर्ण और असवर्ण/अवर्ण’ शब्दों की राजनैतिक खेती क्यों की जा रही है? चौथी व्यवस्थान्तर्गत ‘शूद्र’ को रखा गया है, जिसमें सारी अनुसूचित जातियाँ और अनुसूचित जनजातियाँ आती हैं। ये जातियाँ ‘सेवक’ के रूप में जानी जाती थीं। ऐसे में, स्वाभाविक प्रश्न है : भारत में ‘सवर्ण’ कौन नहीं है। क्षत्रिय के अन्तर्गत सूर्यवंशी, यदुवंशी इत्यादिक आते हैं। वैश्य के अन्तर्गत कायस्थ, अग्रसेन इत्यादिक आते हैं।
दूसरी व्यवस्था ‘आश्रम-व्यवस्था’ है। समाज को सुव्यवस्थित ढंग से संचालित होने देने के लिए चार प्रकार की ‘आश्रम-व्यवस्था’ लायी गयी थी, जो इस प्रकार हैं :—
१- ब्रह्मचर्य २- गृहस्थ ३- वानप्रस्थ ४- संन्यास।
अब इन दोनों प्रकार के व्यवस्थातन्त्र को पुन: लागू करने का समय आ गया है, अन्यथा भारतीय समाज का पूर्ण पतन अवश्यम्भावी है।
(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, इलाहाबाद ; ४ अप्रैल, २०१८ ई०)