
(प्रख्यात भाषाविद्-समीक्षक)
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय-
सम्मानित देशवासीगण!
आज भारत राष्ट्र की अखण्डता, एकता तथा सम्प्रभुता संकट में है। अपने देश का लोकतन्त्रीय ढाँचा ध्वस्त होने की स्थिति में है। इसके लिए देश का सत्तापक्ष और प्रतिपक्ष उत्तरदायी हैं। विपक्ष दलों की सत्तासीन दल के प्रति सामूहिक अथवा एकल रणनीति समझ से परे है क्योंकि अब आपसी कटुता भुलाकर, एक मंच पर आने की जो आवश्यकता है, उसका लक्षण दूर-दूर तक नहीं दिख रहा है।
भारतीय जनता पार्टी (एन०डी०ए०) के वर्तमान सत्ता-संचालकगण की साम्राज्यवादी विस्तारनीति देश में जाति, वर्ग, सम्प्रदाय को आपस में लड़ाते हुए, नित-नयी समस्याओं में उलझाकर, अपना उल्लू सीधा करते रहना है। यही कारण है कि वर्तमान सत्ताप्रमुख जिस तरह से ज़ह्र उगलते हुए अपना भाषण करता है, उसके प्रतिशब्द में पूरी तरह से एक ‘विस्फोटक तानाशाह’ का चित्र उभरता है। उसकी सत्ता में बने रहने के प्रति अन्धभक्ति इतनी प्रबल है कि वह सम्पूर्ण भारत में एकच्छत्र अपना अधिनायकत्व स्थापित करने के लिए बेचैन है। झूठ-पर-झूठ बोलनेवाला ऐसा प्रधान मन्त्री ऐतिहासिक बन चुका है। इस दृष्टि से देश को वैमनस्य और घृणापूर्वक कई हिस्सों में बाँटनेवाले दो प्रधान मन्त्री सामने आ चुके हैं : पहला नाम, ‘विश्वनाथ प्रताप सिंह’ का है, जिन्होंने ‘मण्डल आयोग’ की सिफ़ारिशें लागू कर, देश में ‘वर्गविभाजन’ की नीवँ ‘आरक्षण’ के रूप में सामने लाकर, ‘योग्यता की गोद में अयोग्यता’ को बिठवाकर भारतीय राजनीति के इतिहास में ‘कालिमापूर्ण अध्याय’ जोड़ दिया था, जिसके लिए उस व्यक्ति ‘विश्वनाथ प्रताप सिंह’ को ‘भारतराष्ट्र’ कभी क्षमादान नहीं कर सकता। उस प्रधान मन्त्री की आरक्षणनीति के दूरगामी परिणाम और प्रभाव को देखते, समझते हुए तथा उसे धिक्कारते हुए, हमारे देश के कई युवाओं ने आत्मदाह कर, अपनी जीवनलीला समाप्त कर दी थी। उन दिवंगत युवाओं की ‘हाय’ ऐसी लगी कि विश्वनाथ प्रताप सिंह ‘रक्त कैंसर’ से ग्रस्त हो गया और जब तक ज़िन्दा रहा, जीते रहने के लिए विदेश में जाकर ख़ून बदलवाता रहा।
दूसरा प्रधान मन्त्री, हमारे ‘प्रधान जनसेवक’ के रूप में ‘नरेन्द्र दामोदर भाई मोदी’ हैं, जो देश की गति-प्रगति के लिए आश्वासन देते हैं; घोषणाएँ करते हैं फिर अपनी नाकामी छिपाने के लिए, उसे ‘जुम्लेबाज़ी’ का नाम देते हैं। इतना ही नहीं, देश में ‘हिन्दू-मुसलमान-दलित’ की नितान्त गर्हित राजनीति करते हुए, भारतराष्ट्र में वैमनस्य, विखण्डन, सम्प्रदायवाद की कुत्सित राजनीति कर और और करवा रहे हैं।
आप ज़रा पिछले लोकसभा-चुनावों और उत्तरप्रदेश-विधानसभा-चुनाव के समय भारतीय जनता पार्टी के प्रत्याशी और देश के प्रधान मन्त्री नरेन्द्र मोदी के चुनावी भाषणों को याद कीजिए। उन्होंने किस तरह से लोकसभा और विधानसभा-चुनावप्रचार करते समय यू०पी०ए० सरकार के समय के प्रधान मन्त्री डॉ० मनमोहन सिंह और उत्तरप्रदेश के निवर्तमान मुख्य मन्त्री अखिलेश सिंह यादव के लिए कितने कटु शब्दों के प्रयोग किये थे और उनकी कमियाँ गिनाते हुए, काला धन, लोकपाल विधेयक, धारा ३७०, आवास-समस्या, किसानों, सैनिकों तथा महिलाओं की दुरवस्था, बिजली, पानी, शौचालय, गड्ढायुक्त सड़कों, विषम आर्थिक नीतियों, सामाजिक विषमताओं, भ्रष्टाचार, वंशवाद, बेरोज़गारी, तरह-तरह की महँगाई आदिक के लिए ५६ इंच का सीना उचका-उचका कर, विषाक्त भाषण करते रहे और आश्वासन देते रहे : ‘मेरी सरकार’ यदि सत्ता में आयी तो इन सारी विसंगतियों को दूर करूँगा।
हम सभी ने डॉ० मनमोहन सिंह के समय के भ्रष्टाचार, महँगाई, बेरोज़गारी, सुरक्षा आदिक उक्त विसंगतियों से ही मुक्ति पाने के लिए ही मोदी के ओजस्वी और प्रभावपूर्ण भाषण के वशीभूत होकर, ऐतिहासिक बहुमत के साथ सत्ता सौंपी थी परन्तु सत्तासीन हुए, नरेन्द्र मोदी को लगभग चार वर्ष हो रहे हैं परन्तु आज तक एक भी आश्वासन मोदी पूर्ण नहीं कर सके हैं, क्यों? चूँकि हमने उन पर विश्वास कर, उन्हें सत्ता का अधिकारी बनाया है, इसलिए अधिकारपूर्वक हम नरेन्द्र मोदी से प्रश्न करते हैं : आपने भारत की १ अरब ३० करोड़ जनता के साथ छल क्यों किया है? क्या हमारा अपराध यही था : हमने आपको ससम्मान सत्ता पर समासीन किया है? यदि यह अपराध है तो हम देशवासी अपने इस अपराध को माथे लगाकर, आपको ‘सत्ताच्युत’ भी कर सकते हैं।
ठीक वैसी ही स्थिति उत्तरप्रदेश के मुख्य मन्त्री आदित्यनाथ योगी की है। उत्तरप्रदेश में इस समय नागरिक-सुरक्षा, विधि-व्यवस्था, रिश्वतख़ोरी, गड्ढायुक्त सड़कें, शिक्षित युवा बेरोज़गारी, गुण्डागर्दी, किसानों की दयनीय स्थिति, स्वास्थ्य, शिक्षा, परीक्षा, सेवाओं में विसंगति, साम्प्रदायिकता आदिक के प्रति योगी की दृष्टि सजग नहीं दिखती अन्यथा अपने राज्य के प्रति मूल कर्त्तव्य से विमुख होकर, वे गुजरात, कर्नाटक, बंगाल आदिक राज्यों में जाकर चुनावी राजनीति करते हुए, मीडिया के शब्दों में, ‘पोस्टर ब्वॉय’ के रूप में रेखांकित होते हुए, उत्तरप्रदेश के मुख्य मन्त्रित्व की गरिमा को ध्वस्त करते नहीं दिखते क्योंकि हमने उन्हें ‘पोस्टर ब्वॉय’ बनने के लिए नहीं चुना था।
इससे सुस्पष्ट हो जाता है कि उत्तरप्रदेश के मुख्य मन्त्री आदित्यनाथ योगी की प्राथमिकता में ‘उत्तरप्रदेश’ न होकर, ‘हिन्दू-हिन्दुत्व’ की राजनीति कर, राष्ट्र-विभाजन करते हुए, सम्पूर्ण देश में ‘चक्रवर्ती सम्राट्’ बनना है।
योगी ने क्या-क्या आश्वासन खुले मंचों से किये थे; अपने चुनावी घोषणापत्रों में क्या-क्या वायदे किये थे?
ख़ुद को ‘प्रधान जनसेवक’ कहनेवाला व्यक्ति कितना अहंकारी हो चुका है, कभी विचार किया है? मोदी-योगी और अमित शाह ने ‘हिन्दी-हिन्दुत्व’ के नाम पर देश की आन्तरिक स्थिति कितनी कमज़ोर कर दी है?
किसानों की शोचनीय दशा, जवानों की अवहेलना, शिक्षित बेरोज़गार युवावर्ग की जायें-तो-कहाँ-जायें’ की दुरवस्था, महिलाओं की सुरक्षादिक विषयों, स्वास्थ्य, शिक्षा, परीक्षा, सेवादिक में विसंगतियों, असन्तुलित आर्थिक नीति आदिक के प्रति वर्तमान सरकार ज़रा भी चिन्तित नहीं दिख रही है; दिख रही है तो बेहद घटिया मानसिकता ‘भगवा’, ‘हिन्दू-मुसलमानों’ को लड़ाना, दलितों की राजनीति, अपने विरुद्ध बोलनेवालों को आतंकित करना-जैसी गर्हित नीति-नीयत।
हमें किसी भी दल के प्रति अनुराग नहीं करना है। हम सभी के लिए भारत राष्ट्र की अक्षुण्णता, अखण्डता, एकता, सम्प्रभुता महत्तम है। जो भी दल आचरण-स्तर पर हमारे भारत राष्ट्र और लोकतन्त्रीय मर्यादा को सबल-समृद्ध करने करने की दिशा में जब तक सन्नद्ध रहेगा; जागरूक रहेगा, हम भारतवासी साथ देंगे, अन्यथा उस सत्ता को उखाड़ फेकेंगे।
आइए! राष्ट्रहित में हम साथ-साथ रहें; साथ-साथ चलें। हमारी पारस्परिक जो भी विषमता हो, उसे समता के मार्ग पर लायें।