
(प्रख्यात भाषाविद्-समीक्षक)
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय-
आश्चर्य होता है कि इलाहाबाद (उत्तरप्रदेश) में सड़कें बनायी जाती हैं और छ: माह के भीतर उनमें दरारें पड़ जाती हैं। यहाँ से ऐतिहासिक राष्ट्रीय राजमार्ग ‘ग्रैण्ड ट्रैंक रोड’ गुज़रती है परन्तु उस ‘रोड’ को देखकर ऐसा लगता है, मानो कोई अति सामान्य ‘रोड’ हो। पी०डब्ल्यू०डी०, नगर निगम तथा नगर और ज़िला-प्रशासन अपने उत्तरदायित्व के प्रति कितने बेईमान हैं, इससे ज़ाहिर हो जाता है।
ज्ञातव्य है कि इलाहाबाद नगर को पाँच राष्ट्रीय और राजमार्ग जोड़ते हैं, परन्तु शर्म की बात है कि ‘स्मार्ट सिटी’ का ख़्वाब दिखानेवाला यहाँ का प्रशासन १४ करोड़ रुपये से बनवायी गयीं सड़कों को ध्वस्त होते देख रहा है। ‘चतुर्भुज’ परियोजना के अन्तर्गत ‘इलाहाबाद-वाराणसी’ और ‘इलाहाबाद-कानपुर मार्ग’ तो बन गये परन्तु शेष तीन राज मार्गों– इलाहाबाद-लखनऊ राजमार्ग, इलाहाबाद-रीवा राजमार्ग तथा इलाहाबाद-मीरज़ापुर राजमार्ग अपनी बदहाली पर आँसू बहा रहे हैं।
नगर की २९ सड़कों का उद्धार करने के लिए चयन किया गया है, जिनमें जी०टी० रोड, ज़ीरो रोड, हीवेट रोड, हिन्दी साहित्य सम्मेलन मार्ग, विश्वविद्यालय मार्ग, म्योर रोड, टी०बी०सप्रू मार्ग, थॉर्नहिल रोड, नवाब यूसुफ़ रोड, चकिया, राजरूपपुर रोड आदि शामिल हैं, जिनके लिए लगभग ६ करोड़ रुपये व्यय होना बताया गया है। पहले बताया गया था कि वे सड़कें बीते जून तक बना दी जायेंगी परन्तु अभी तक एक सड़क भी नहीं बन पायी है, क्यों? इसके लिए कौन ज़िम्मेदार है?
इलाहाबाद नगर से आगे निकलकर जब मैं ज़िला-मार्गों पर बढ़ता हूँ तब सड़कों की सारी वास्तविकता एक साथ मिलकर उत्तरप्रदेश के मुख्य मन्त्री आदित्यनाथ योगी की ‘गड्ढामुक्त सड़कों’ की घोषणा को करारा तमाचा मारती दिखती हैं।
इलाहाबाद नगर और जनपद की चारों दिशाओं के सड़क-मार्ग हर एक मुसाफ़िर को मौत का निमन्त्रण देते नज़र आ रहे हैं। ऐसा नहीं कि सम्बन्धित प्रशासन और विभाग इनसे नावाक़िफ़ हो, सच यह है कि इन अधिकारियों के ख़ून में बेईमानी दौड़ रही है।
पिछले वर्ष यहाँ के कई हिस्सों में ज़ोरदार बारिश हुई थी, जिसमें सड़कों के सारे गड्ढे पानी से भर गये थे, जिसके कारण आने-जानेवाले लोग उन गड्ढों के शिकार होकर अपने हाथ-पैर तुड़वा चुके थे। यही नहीं, कई वाहन दुर्घटनाग्रस्त हो चुके थे; फलस्वरूप अब तक बड़ी संख्या में लोग अपनी जान से हाथ धो चुके हैं।
इलाहाबाद में जब मूसलाधार वर्षा होती है तब जलभराव के कारण सारे गड्ढे ढँक जाते हैं। इस कारण आवागमन करनेवाले पथिक और वाहन दुर्घटनाग्रस्त हो जाते हैं। इलाहाबाद की कोई भी सड़क देख लीजिए, हर पल मौत अपने पास बुलाती नज़र आती है।
आश्चर्य है, यहाँ के मण्डलायुक्त और ज़िलाधिकारी को सड़कों के ख़ौफ़नाक गड्ढे दिखायी नहीं दे रहे हैं, जबकि उनकी गाड़ियाँ प्रतिदिन उन गड्ढों से होकर गुज़रती हैं; फिर भी वे ‘विशेषाधिकार’ प्रयोग कर आदेश जारी करने से कतरा रहे हैं।
दूसरी ओर, यहाँ की अधिकतर सड़कें खोद दी गयी हैं। सड़कों पर कांक्रीट बिछा दी गयी हैं। इस कारण आने-जाने में पथिकों और वाहनों को बहुत दिक़्क़तें हो रही हैं। कई सड़कों पर मेन होल के ढक्कन खुले पड़े हैं। सड़कों पर सीवर बेतरतीब तरीक़े से लगाये गये हैं। सड़कों के किनारे कूड़़े-करकटों के अम्बार लगे हुए हैं।
यह तथ्य भी ग़ौर करने लायक़ है कि चार माह के बाद माघ मेला का आयोजन होगा, जिसमें शासन की ओर से प्रशासन को एक बड़ी धनराशि आबण्टित की जाती है। उस धनराशि के एक बड़े हिस्से को डकारने के लालच में प्रतिवर्ष इलाहाबाद की अच्छी-ख़ासी सड़कें खुदवा दी जाती हैं और मेले की सुव्यवस्था करने के नाम पर मिली धनराशि का एक अच्छा-ख़ासा भाग उन सड़कों को तन्दुरुस्ती की टॉनिक पिलाने में ख़र्च कर दिया जाता है। इसके बाद भी सड़कें रुग्ण बनी रहती हैं और सड़कों की तिमारदारी करनेवाले सारे लोग माल काटकर ५६ इंच का सीना फुलाते हुए, रातोरात ‘लखपति’ बन जाते हैंः
बेशक, इन सारी आपराधिक लापरवाहियों के लिए नगर-ज़िलाप्रशासन, नगर निगम और पी०डब्ल्यू०डी० के उच्च पदस्थ अधिकारी तथा यहाँ के सारे जनप्रतिनिधि उत्तरदायी हैं। इन सबके विरुद्ध कठोर कार्रवाई कौन कर सकता है?