अतीत होते मेरे सहयात्री!

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
(प्रख्यात भाषाविद्-समीक्षक)

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय-


अपने बलिष्ठ कन्धों पर
तीन सौ पैंसठ दिनों के भार
पल-पल लाद कर
अनवरत-अनथक यात्रा करते-करते
अतीतोन्मुख सहयात्री!
तुम क्लान्त हो चुके हो।
अब तुम्हें चिर-निद्रा की ओर बढ़ना है
तुम्हारे जीवन के अवसान की
पटकथा लिखी जा चुकी है |
कल-चक्र के दोनों पहिये जैसे ही
अंक बारह का संस्पर्श करेंगे
तुम नेपथ्य में समा जाओगे–
एक सुलझा-अनसुलझा इतिहास बनकर।
शिकवा-शिकायत-गिला
तुमसे नहीं, स्वयं से है।
काश कुछ सँभल लिया होता ………..
इतना भी गिला नहीं
सँभाल न सकूँ, अपने चेतन को
सन्तुलित न कर सकूँ
जीवन के ओर और छोर को।
मैंने अब आकार लेने आरम्भ कर दिया है
अगले तीन सौ पैंसठ दिनों के समानान्तर।
मेरी मति-रति-गति
विभावना और सम्भावना के झूले में झूलती हुईं
आरोह-अवरोह की जुगलबन्दी के साथ
संवाद और विवाद,
संस्कृति और विकृति की पटकथा
लेखन करने का पूर्वाभ्यास कर रही हैं।