महेन्द्र महर्षि, गुरुग्राम (से.नि. वरिष्ठ प्रसारण अधिकारी, दूरदर्शन)
मैंने अपनी हाई स्कूल की परीक्षा अजमेर नगर के स्टेशन रोड पर स्थित गवर्नमेंट मोइनिया स्लामिया हाई स्कूल से 1957 में पास की। श्री मुज़फ़्फ़र अली तब स्कूल के हेडमास्टर थे। दरम्याना छरहरा बदन, सिर पर टोपी, बदन पर फबती शेरवानी, अलीगढ़ी पजामा और पैरों में तत्कालीन समय में ‘लोफर’ बनावट के जूते जिनमें चढ़े सफ़ेद बुर्राक मौजों में छिपे उनके चरणों के हमने , सालों साल स्कूल में पढ़ते ,यक़ीन से कहूँ कभी दर्शन नहीं किए।उनके जूतों में से बस उतनी ही आवाज़ होती जितनी कि चूहे पर झपट्टा लगाती बिल्ली के पंजों में , उसे धर दबोचने के पलों में सुन पड़ती है। वे न जाने कहाँ से कब नज़र आ जाएँ, यह डर स्कूल में हम बच्चों को तो रहता ही था, हमारे टीचर भी इससे आतंकित रहते हुए से लगते थे।
मुज़फ़्फ़र अली अपने हाथ में नक़्शे नवीसों के इस्तेमाल का एक काला रूलर भी रखते , जो उनके व्यक्तित्व का एक हिस्सा ज़रूर था मगर उसका इस्तेमाल करते हुए उन्हें हमने कभी नहीं देखा। शायद वह रुतबे का वैसा ही हथियार था जैसा कि आज के होमगार्ड की वर्दी।
वे वक्त के और छुट्टी पर न जाने के बड़े पाबन्द रहे होंगे वर्ना कभी तो ऐसा होता कि हम स्कूल गए हों और उन्हें न देखा हो। वे सिगरेट पीते थे और हेडमास्टर साहब का कमरा उसकी गंध से उनके ऐब की पोल खोल देता था। यों अपने कमरे से बाहर हमने उन्हें सिगरेट के कश लगाते कभी नहीं पाया।
उस दौर के जिन तीन अध्यापकों की मुझे आज भी स्मृति है, उनमें एक थे बृजेश चन्द शर्मा, जो दूर में मेरे अपने कुल से थे। वे हमें अंग्रेज़ी पढ़ाते थे। मुझे जितनी अंग्रेज़ी आती है उसकी आधार शिला उन्होंने ही प्रदान की। उनके हर रोज़ दो पीरियड होते थे क्यों कि एक पीरियड जनरल इंगलिश का सभी विद्यार्थियों के लिए था और दूसरा इसलिए कि मैंने तीन आप्शनल में से एक इंग्लिश लिट्रेचर लिया था। तब यह स्कूलों में लागू सेंट्रल बोर्ड आफ स्कूल, अजमेर और दिल्ली, के सिलेबस की व्यवस्था थी। इंटरमीडिएट और बी.ए. में भी मैंने यह क्रम जारी रखा और एम.ए. भी अंग्रेज़ी में किया।
मुझे अपने ईकोनोमिक्स के अध्यापक , उनकी वेशभूषा, टोपी व पढ़ाने की महारत , आज भी ज्यों की त्यों याद है। बदक़िस्मती से उनका पूरा नाम कई बार ज़ोर लगाने के बाबजूद याद नहीं आता। वे महेश्वरी साहब थे। एक और नाम , चेहरा मोहरा जो मुझे याद है , जिसने मुझे पढ़ाया कभी नहीं मगर कपड़े पहनने का शहूर ज़रूर दे दिया। वे थे इलियास महाराज। ख़ूबसूरत चेहरा , गौर वर्ण , बड़े , हाँ साहब बड़े सलीक़े के मुस्लिम परिधान या फिर कोट पैंट क़मीज़, कुछ भी उनपर बहुत फबता था। वे दरगाह के ख़ादिम परिवारों में से थे लेकिन नफ़ासत में क़ाबिले तारीफ़। बाद में जब मैं कालेज में पढ़ रहा था तो मैंने उनके लिए अपनी दीवानगी उनके सामने बखान कर दी और वे फिर लगभग मेरे दोस्त बन गए। यह दोस्ताना मेरे अजमेर से 1964 में दिल्ली आ जाने के बाद तक चला। मुझे नहीं लगता कि उस दौर के ये प्रेरक चेहरे अब होंगे।
मोइनियां को छोड़े हुए लगभग 62 साल बाद यादों की यह झंकार आज मुझे तब झन्ना गई जब मैंने टी.वी. पर यह खबर देखी कि एक स्कूल के अध्यापक को इसलिए सस्पैंड कर दिया गया है कि उसने वह प्रार्थना बच्चों से बुलवा दी जिसे 62 साल पहले तक ‘गवर्नमेंट मोईनिया स्लामिया हाई स्कूल, अजमेर ‘ के लगभग 7 आठ सौ छात्र हर सुबह आँख मूँदकर बड़े आदर भाव से दुआएँ माँगते हुए समूह में गाते थे। इन छात्रों में आधे से अधिक ग़ैर मुस्लिम परिवारों के होते थे। यह रचना थी:
“लब पे आती है दुआ बनके
तमन्ना मेरी……….
मेरे अल्लाह बुराई से बचाना
मुझको,
नेक जो राह हो उसी राह पे
चलाना मुझको………”
दुआओं का यह गीत किसी वक्त अल्लामा इक़बाल ने लिखा था। उससे भी पहले एक और रचना आई थी “वन्दे मातरम….”। मोईनिया में यह भी सुबह की प्रार्थना का हिस्सा थी और उसी तन्मयता से गाई जाती थी ।
मैं सोच रहा हूँ कि तब का समय वो था जिसमें देश विभाजन के दंश से खून कहीं अधिक कड़वाहट से रिस रहा होगा, यादें कसमसाहट पैदा करती होंगी क्योंकि वह पीढ़ी मौजूद थी जिसने वह मंजर देखा भोगा और सहा था।
मगर न तो मुज़फ़्फ़र या बृजेश , महेश्वरी और इलियास , न तो किसी से द्वेष रखते थे और ना ही उनके होंठ बच्चों की मार्निंग असेम्बली में चिपके रहते थे। उनसे भी प्रार्थना के सुर और मातृभूमि की वंदना के छनकते हुए बोल सैंकड़ों बालकों का साथ देते थे।
बँगला की रचना राष्ट्र गीत बन कर मान्य हुई, हिन्दी का वन्दे मातरम् देश के प्रति समर्पण के तौर पर मान्य हुआ, उर्दू की रचना में नेक राह पर चलने की दुआ माँगती हुई मशहूर तराने के तौर पर प्रचलित हुई , तो फिर अचानक यह कैसा दौर आया कि सोए हुए घाव नासूर बन कर बहने लगे हैं।
देश की सीमाएँ चुनौती बनी हुई ललकार रही हैं, मंदी और निराशाएँ जन जीवन को झिड़कने में लगी हैं, तो फिर ज़रूरी जज़्बा और जन बल कहाँ से जुट पाएगा ? न्यूक्लियर धमकी का जबाब समान धमकी में नहीं। विवेक और वैज्ञानिक सोच को जनजागरण का चप्पू बनाकर सागर की छाती पर तैरना कुछ मुश्किल नहीं। चलो लिख लें:
“ मेरे ईश्वर बुराई ही मेरी बताएँ मुझको,
सही जो मार्ग है उसी पे चलाएँ मुझको।”
—1957 से 2019 की मेरी यात्रा के कई पड़ावों के बाद का मेरा , आपका ,सबका आज।
-महेन्द्र महर्षि
18.10.2019
गुडगांव.