आत्मीय मित्रमण्डल!
समय का समादर करना सीखें। समय सभी को समान रूप से देखता आया है। वह प्रत्येक मनुष्य का मूल्यांकन उसके कर्मों के आधार पर करता आया है। समय कभी निष्ठुर नहीं होता; प्रत्युत मनुष्य की तामसिक प्रवृत्ति जब ‘अतिवाद’ की परिधि के साथ जुड़ जाती है तब उसके वैकारिक (विकार से सम्बन्धित) आचरण की सभ्यता प्रकाशित होने लगती है; परिणामत:-प्रभावत: वह दण्ड का भागी बनता है, फिर वह कहता है– समय उसका साथ नहीं दे रहा है; उसका समय ख़राब चल रहा है, जबकि समय अपने सात्त्विक रूप मे बढ़ता रहता है।
हम इस अवधारणा से पृथक् कोई मत व्यक्त नहीं कर सकते कि वर्तमान समय मे हम संकट-संत्रास-संघर्षण को जी और भोग रहे हैं। हम सभी विगत चार वर्षों से ‘कोविड’ और समस्तरीय अनेक विषाणुओं के कुप्रभाव से भयातुर रहे हैं; क्योंकि मृत्यु का अप्रत्याशित गमनागमन (‘आवागमन’ अशुद्ध है।) का हम सभी साक्षी रहे हैं।
उस संक्रमणकाल-जैसी स्थिति की पुनरावृत्ति हो सकती है, हम इसे अस्वीकार नहीं कर सकते। वैसे वातावरण मे, हम सभी को सपरिवार, इष्ट-मित्रवृन्द के साथ महामारी-संक्रमण के समय मे अपनी इच्छाशक्ति को सुदृढ़ किये रहने की आवश्यकता है। आप यदि ऊर्जावान् रहते हुए, अभावग्रस्त व्यक्ति की किसी भी रूप मे सहायता करने में समर्थ हों तो निश्चित रूप से करें। आपकी ‘सदाशयता’ मनुष्यता को चरम पर समासीन करेगी।
कालचक्र कभी सम नहीं रहता। यही कारण है कि सभी के जीवन मे कभी आँखों मे बदली घिरती रहती है तो कभी प्रकृति मे। यही दु:ख-सुख का गमनागमन है। कोई स्वयं को यह समझे कि वह अद्वितीय पराक्रम से परिपूर्ण है तो यह उसकी भूल है या फिर अहम्मन्यता के आवरण के कारण उसकी दृष्टि ‘सत्य-संधान’ करने मे समर्थ नहीं बन/हो पाती।
यथार्थ के धरातल पर हमारा-आपका कोई मूल्य नहीं। ऐसा इसलिए कि जो कुछ भी दिखता है, वह ‘सत्य’ नहीं होता, अन्यथा ‘मिथ्या’ का अस्तित्व कब का मिट चुका होता।
मैथिलीशरण गुप्त स्मरण हो आते हैं, “मरा नहीं वही कि जो जिया न आपके लिए।”
(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १२ मई, २०२२ ईसवी।)