कब तक

राघवेन्द्र कुमार “राघव”-

EDITOR IN CHIEF

कल भी मरी थी

कल भी मरेगी ।

आखिर वो

कितनी बार जलेगी ।

पहले तो तन को

भेड़िया बन नोच डाला ।

शरीर से आत्मा तक

जगह-जगह छेद डाला ।

लाश बच रही थी

न जिएगी और न मरेगी ।

आखिर वो

कितनी बार जलेगी ।।

घर से बाहर तक

हर कोई याद दिलाता है ।

दर्द बांटना तो दूर

दर्द को खरोंच-खरोंच

नासूर बनाता है ।

क्या घर में भी वो

इसी तरह लुटेगी ।

आखिर वो

कितनी बार जलेगी ।

उसकी आंखों में सहमे

आंसुओं के कतरे ।

टूट–टूटकर गिरते

एक–एक कर सपने ।

कब तक ये

मानसिक रोगियों की

शिकार बनेगी ।

आखिर वो

कितनी बार जलेगी ।।