परिसंवाद का विषय : यदि पुत्र ‘कुपुत्र’ होता है तो माता भी ‘कुमाता’ होती है?

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
(प्रख्यात भाषाविद्-समीक्षक)

०परिसंवाद-आयोजन०


सूत्रधार-संयोजक : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय


  •  कर्ण का दोष क्या था?
  •  पन्ना धाय के पुत्र का दोष क्या था?
  •  एकलव्य का दोष क्या था ?
  • कबीर का दोष क्या था?
  •  ध्रुव का क्या दोष था?

पौराणिक-ऐतिहासिक ग्रन्थों में ऐसी बहुत सारी कुमाताएँ भरी पड़ी हैं, जिनसे उत्पन्न सन्तानों का क्या अपराध था, जिन्हें तथाकथित समाज अपमानित करता आ रहा है?

  • आज-कल की जो कुमारियाँ व्यभिचार में रमी रहती हैं और गर्भवती होने पर लोक-लज्जा का स्मरण आते ही भ्रूण-हत्या, शिशु-हत्या, शिशु-परित्याग करने से किञ्चित नहीं हिचकतीं– ये सब किस ‘सुमाता’ की परिभाषा के अन्तर्गत रेखांकित होती हैं ।
  • आज अधिकतर घरों में कलह, बीभत्स तथा नारकीय वातावरण बनाने के लिए जिन माताओं की कुत्सित भूमिका रही है, उन्हें आप किस प्रकार की ‘माता’ के अन्तर्गत रेखांकित करेंगे? क्या ऐसी महिलाएँ आराध्या हैं? यदि हाँ तो कैसे?
    यहाँ आज इस विषय पर जागरूक अभिव्यक्ति की अपेक्षा की जाती है; स्वागत है।

राम नारायण दुबे- अकाट्य सत्य गुरु जी

डॉ. पृथ्वीनाथ पाण्डेय- ऐसी सन्तानों को वर्तमान परिप्रेक्ष्य में कैसे सम्मानित स्थान दिलाया जा सकता है?

राम नारायण दुबे- माता कुमाता न भवति… का तथ्य सिर्फ पुत्र को संस्कारी भाव प्रकट कराया गया आज तक। बाकी एक पुत्र की कमना में कितने भ्रूणहत्या हो रही है …

डॉ. पृथ्वीनाथ पाण्डेय- दुबे जी! सत्य कथन है। लोग “माता कुमाता न भवति” कहते हैं और ऐसी बिनब्याही माताओं को कोसते भी हैं।

पुरुषोत्तम फौजदार- आदरणीय बहुत सटीक

डॉ. पृथ्वीनाथ पाण्डेय- यह वैषम्य समाज में न पनपे, इसमें हमारा-आपका किस प्रकार का योगदान हो सकता है?

विवेक तिवारी- यथार्थ

डॉ. पृथ्वीनाथ पाण्डेय- ऐसी कुमारियों को असत् पथ पर बढ़ने से पहले ही कैसे रोका जा सकता है?

अनिवेर्ति तिवारी- सर विधि प्रपंच गुण-अवगुण से सनी हुई है अतः आपका यह कथन अकाट्य सत्य है

डॉ. पृथ्वीनाथ पाण्डेय- उन्हें अवगुणों से कैसे बचाया जा सकता है?

अनिवेर्ति तिवारी- सर ग्यान एवं संस्कार द्वारा रोका जा सकता है

डॉ. पृथ्वीनाथ पाण्डेय- वह ज्ञान और संस्कार कैसे आरोपित किया जायेगा?

अनिवेर्ति तिवारी- सर अनुशासन एवं स्वतः के प्रयास से

डॉ. पृथ्वीनाथ पाण्डेय- आपके सुझाव सराहनीय हैं।

अरुण कुमार कौशिक कटु सत्य ।

डॉ. पृथ्वीनाथ पाण्डेय- ऐसी कुमारियों को बहकने से कैसे रोका जा सकता है?

नूतन पटेरिया- वर्तमान परिवेश में ही नही सदियों से माता का चरित्र ही सन्तान का संस्कार बना है कतिपय माताओ की संस्कारहीन धरोहर ने कई व्यभिचारी और अपराधी किस्म के लोग समाज को दिए है ऐसी कुसंस्कारी माताओ को कुमाता कहना कोई अपवित्र कथन नही है

डॉ. पृथ्वीनाथ पाण्डेय- पटेरिया जी! उन्हीं कुमारियों में से कुछ ऐसी भी होती हैं, जिन्हें परिस्थितियाँ ग़लत मार्ग पर जाने के लिए विवश कर देती हैं और उन्हें समाज ‘कुलटा’, ‘व्यभिचारिणी’ इत्यादिक शब्दों से सम्बोधित करता है। ऐसे में, हमारी-आपकी भूमिका क्या बनती है?

नूतन पटेरिया- सर ये पता करना तो कठिन है विवश थी या विवशता नाम दिया जा रहा पर यदि वास्तव में विवशता है तो फिर हमारा दायित्व बहुत जिम्मेदारी वाला हो जाता उन्हें समाज मे उपयुक्त स्थान दिलाना समाज की सोच में बदलाव

डॉ. पृथ्वीनाथ पाण्डेय- समाज के सोच में कैसे बदलाव किया जा सकता है?

नूतन पटेरिया- हमारे जैसे कुछ लोगो को आगे आना होगा जब कुछ लोगो की आवाज निर्दोष को कुलटा व्यभिचारिणी बना सकती है तो कुछ दबंग और हिम्मती आवाज उसे दोष मुक्त और सम्मानित भी बना सकती है समाज बदलाव स्वीकारता है बस प्रयास होना चाहिये कुछ लोगो को आगे आना होता है

डॉ. पृथ्वीनाथ पाण्डेय- उत्तम सुझाव है।

अशोक कुमार तिवारी- नूतन और पृथ्वीनाथ जी आज के समय स्थितियाँ और विकट हैं – सभी संभ्रांत महिला -पुरुषों से क्षमायाचना के साथ मैं कुछ कड़वे सच बताना चाहता हूँ जो दुबई आदि से छन-छन कर आ रहे हैं :— सावधान मित्रों ! महिला जगत हमारे लिए शुरू से वन्दनीय रहा है पर आज उन्हें भी भटकाने की कोशिश की जा रही है :—-( विदेशों से पेट्रोडालर की अंधाधुंध आपूर्ति के साथ ही साथ , देश की अधिकतम करेंसी लेकर रिलायंस भी पाकिस्तानी-चीनी व्यापारों के निंदनीय व्यापार के साथ ही साथ इस दुष्कृत्य में भी शेयर- व्यापार ( भंसाली – रासलीला-पद्मावती फिल्म आदि ) के नाम पर लगी है -) वाटस अप के हिन्दी दर्शन ग्रुप पर बहुत दुखद है –महत्वपूर्ण जानकारी —– कश्मीर के उग्रवादियों द्वारा वहां के मूल निवासियों को पीटा जा रहा है और अभी तो ये उग्रवादी फोर्स पर भी हमला कर रहे हैं कुछ लड़कियां बांग्लादेश-असम बॉर्डर से आकर फोर्स में तैनात हमारे अविवाहित अफसरों को भी अपने चंगुल में फंसा ली हैं – जो खुलेआम पाकिस्तान को अच्छा कहते हैं , भारतीय संस्कृति, परंपराओं का मजाक सोशल मीडिया पर उड़ाते हैं और यदि कोई उनको समझाने की कोशिश करे तो उनके प्यार के चंगुल में फंसे एक्सपर्ट समझाने वाले को ही गलत फोटो-सूचना आदि डालकर मीडिया में बदनाम करके फिर ब्लैक मेल करते हैं– — शहीद की बेटी का पक्ष लेकर सरकार की भी निंदा खुलेआम करते हैं पता नहीं एयर फोर्स ने इनको क्यों रखा है — आप सभी देशभक्तों से निवेदन है – सावधानी बरतिए !! ——हिन्दू समाज की छीछालेदर हो गई है महिला आतंक बढ़ता ही जा रहा है – या तो क्रिश्चियन समाज की तरह खुली मानसिकता अपना लो या मुस्लिम समाज की तरह रूढ़िवादिता ? बीच का अब नहीं चलेगा – अब तो तथाकथित एडवांस हिन्दू मानसिकता के द्वारा ही हमारे बहादुर सैनिकों पर भी गलत इल्जाम लगाए जा रहे हैं – ये बर्दाश्त के बाहर है ( अन्य धर्मों की छोड़ो अपने लोग ही पीछे पड़े हैं ) ? नेपाल के राजवंश के खत्म होने पर एकमात्र हिन्दू देश भारत के पीछे सभी पड़े हैं ???:– — आप सभी देशभक्तों से निवेदन है – सावधानी बरतिए ! सावधान पाकिस्तानी हथकंडों से सावधान मित्रों !!! अच्छा है कि आप बाप (पुरुष) पर लिखते हैं , आजकल के तथाकथित एडवांस लोगों ने तो बाप को विलेन बना दिया है — पता नहीं वो पाकिस्तान – चीन के भटकाये हुए एडवांस लोग शायद स्वयंभू हैं ???
दिव्या श्रीवास्तव जी कहती हैं कि कोई कुछ भी कहे लेकिन देख रही हूँ कि कुँवारों को ज्यादा चिंता है महिलाओं की । दिव्या जी आपने बिलकुल सही कहां है — कुछ अविवाहित तो महिलाओं के लिए विशेषकर असम-बंगलादेशी मूल की लड़कियों के लिए तो waatsap पर मरने मारने को उतारू हैं — पाकिस्तान असम में बने महिला अत्याचार के वीडियो दिखाकर अपने पिता के साथ-साथ पूरे पुरुष जाति को गालियाँ देकर उन्नत संस्कृति और सर्वोत्तम भारतीय पारिवारिक व्यवस्थाओं को बदनाम कर रहे हैं — गुल्मेहर का सपोर्ट और मोदी का विरोध नहीं करोगे तो आप को बदनाम कर देंगे ऐसी धमकियां भी मिल रही हैं ???

देवमणि मिश्र- कुपुत्रो जायते क्वचिद्पि माता कुमाता न भवति” यह प्रार्थना जगद्जननी के संदर्भ में है, हमारी मान्यता में माता का स्थान स्वर्ग से भी ऊपर रखा गया है और हमारे ऋषियों, मुनियों एवं मनीषियों द्वारा स्थापित आदर्शों की स्थिति मे माता के कुमाता न होने की कल्पना स्थापित है । उस युग में संतान को जीवन देने वाली माँ को पालनकर्त्ती, ममता,वात्सल्य और त्याग की साक्षात् देवी के स्वरूप मे स्थापित किया गया है। आज पाश्चात्य संस्कृति की आधुनिकता से संक्रमित और भौतिकता की चकाचौंध मे आत्ममुग्ध किसी कन्या या नारी को उससे विरत कर त्याग की कल्पना असंभव सी हो गयी है, ऐसे मे अनंतकाल से चली आ रही हमारी आस्था और परम्परा की मान्यतायें टूट रही हैंऔर माता के कुमाता न होने का विश्वास भंग हो रहा है ।

डॉ. पृथ्वीनाथ पाण्डेय- उक्त पुत्रों का अपराध क्या था, जिन्हें अपमानित होना पड़ा था?

देवमणि मिश्र निश्चित ही उनका कोई अपराध नही था ।हमारी सनातन हिंदू परंपरा में ही यह भी स्थापित है कि मनुष्य को उसके पूर्व एवं वर्तमान जन्म के कर्मानुसार पाप और पुण्य का फल मिलता है, यह भी स्थापित है कि संतानों को उनके पूर्व जन्मों तथा उनके माता पिता द्वारा अर्जित/संचित पापऔर पुण्य का भी फल प्राप्त होता है।संभवतः इसी मान्यता के सिद्धान्त के अनुरूप उक्त पुत्रों को अपमानित होना पड़ा हो.

प्रमोद कुमार- माता को कुमाता कहा जाना सुर को असुर कहे जाने के समान है। माता और धरती का कार्य एक ही है। सृष्टि कार्य उद्देश्य है। जहाँ तक संतान के परित्याग करने का प्रश्न है ,यह अस्थायी है देश-काल-वातावरण प्रेरित परिस्थितिजन्य है। माता का देवत्व-गुण इतना उच्चस्तरीय हैकि,कुछेक उदाहरण से इसे ‘कुमाता’ से विशेषीकृत नहीं किया जा सकता। ऐतिहासिक प्रतिभाओं ने कभी अपने जन्म व अपनी माता को नहीं कोसा,जबभी और जोभी टिप्पणी आयी, लोकसमाज (नकारात्मक चिंतकों ) द्वारा हुई।माँ के गर्भ धारण संस्कार से लेकर प्रसव संस्कार तक का जीवन-चरण पवित्र ,सत्य विधिमान्य है, इसमें लोक-लज्जा से माँ द्वारा शिशु परित्याग एक कुसंयोग है जो छद्म- समाज द्वारा कूट रचित है जिसे एक झूठी शान-बान के रूप में भी परिभाषित किया जा सकता है। अस्तु प्रामाणिक आधार माता को ‘कुमाता’ कहने का कोई हो ही नहीं सकता।

देवमणि मिश्र- बहुत सुंदर मित्र, पाण्डेय जी के मूल प्रश्न मे विमर्श के दो बिंदु जुड़े हैं जिसमें पहले बिंदु के परिपेक्ष्य में आपकी प्रस्तुति सर्वथा तथ्यपूर्ण है। मेरी प्रति प्रस्तुति में वर्तमान परिदृश्य पर विचार व्यक्त किया गया है ।

डॉ. पृथ्वीनाथ पाण्डेय- प्रमोद कुमार जी! जब उक्त कुकर्म करनेवाली को आप कुमाता नहीं कहेंगे तब किसी भी प्रकार के कुकर्म करनेवाले को कुपुत्र कहने का अधिकार आपको नहीं है। आप इससे सहमत हैं? यदि नहीं तो क्यों?
आपको ऐसा नहीं लगता कि मात्र आदर्श को बचाने के लिए ‘यथार्थ’ से आँखें चुरायी जा रही हैं?

रवीन्द्र त्रिपाठी- सर पांडेय जी सुप्रभात गोस्वामी जी ने मानस में लिखा है ” सुख दुख पाप पुन्य दिन राती ” साधु असाधु सुजाती कुजाती :: दानव देव ऊँच अरू नीचू अमिय सजीवन माहुर मीचू “””ज़ड़ चेतन गुड़ दोष मय विश्व कीँन्ह करतार “”” यह सृष्टी की विशेषता है यहां माता भी हैं तो यत्र तत्र कुमाता भी दृष्टव्य हैं

सन्तोष कुशवाहा- दुष्कृत्य करने वाली ऐसी नारियाँ स्वछन्दविहारिणी की श्रेणी में आती हैं,जिन पर मानापमान का कोई फर्क नहीं पडता ।

रवीन्द्र त्रिपाठी- विषय बहुत ही मौजूँ है पांडेय जी, निस्संदेह जननी की मर्यादा व गौरव निज कर्तव्य से च्युत माताओं को नहीं नसीब होता जनन रक्षण संस्कार प्रदान एवं अन्य दायित्व के सम्यक निर्वाह पर ही मातृ गौरव सहज में मिलेगा अन्यथा युग युग तक चलती रहे कठोर कहानी रघुकुल में भी थी एक अभागिन रानी

लक्ष्मी नाथ मिश्र- माता कुमाता न भवति के राद्धान्त स्थापन में स्वैरिणी माताओं व जारज संततियों को अभिप्रेत न व्यवहृत किया जाय ।

डॉ. पृथ्वीनाथ पाण्डेय- मिश्र जी! जो नारी भ्रूणहत्या करवाती है; विवाह-पूर्व परपुरुष के साथ सम्भोग कर गर्भवती होने पर निरपराध सन्तान की हत्या करती-कराती है, उसे आप क्या कहेंगे? सूत्रवाक्य और संश्लिष्ट शब्दों में आप प्रतिक्रिया करेंगे तो अन्य सहभागी आपके विचार से वंचित रह जायेंगे।

रवीन्द्र त्रिपाठी- सम्यक वातावरण बनाना होगा ।

डॉ. पृथ्वीनाथ पाण्डेय– त्रिपाठी जी! आपको यदि सम्यक् वातावरण बनाने के लिए कार्यभार सौंप दिया जाये तो आप इसका निर्वहन कैसे करेंगे?

जगन्नाथ शुक्ल- किसी भी कालखण्ड में ऐसे चरित्र समय -२ पर उभर कर आते रहे हैं जिन्होंने ‘पुत्रो कुपुत्रो जायते माता कुमाता न भवति’ को गलत साबित किया है। किसी भी पुरुष/नारी के चाल एवं चरित्र कब राह बदल दें इसकी कोई निश्चित अवधारणा नहीं है, अतएव यदि पुत्र कुपुत्र होता है तो माता भी कुमाता हो सकती है और हाँ! यह संख्या काफी कम मात्रा में ही उभर कर सामने आती है।

अंजनी कुमार सिंह- 16 आने सच। कुंदन की भाँति तपा हुआ यथार्थ जिसे लोग मौन स्वीकृति देते हैं।

वसन्त शर्मा- जैसे कुछ कुकर्मो के आधार पर सभी पुत्र कुपुत्र नही हो सकते वैसे ही माँ एक पवित्र व ममता,ओर वात्सल्यपूर्ण अभिव्यक्ति है। हालांकि यह सही है कि आज कल अपने भौतिक क्षणिक सुख के लिए की लड़कियां /महिलाएं घ्रणित कृत्य कर बैठती हैं और परिणाम को कूड़े दान में फेंक अपनी गलती पर पर्दा डालने का प्रयास करती हैं, पर वे भूल जाती हैं कि “कोई”है जो सब पर नज़र रखता है।
दूसरी ओर इस घ्रणित कार्य मे बराबर का सहयोगी एक पुरुष ही होता है ,जो दुर्भाग्य से पुत्र भी।
इसलिए पुत्र/पुरुष और महिला/माता दोनों ही “कु” विशेषण से सम्मानित करने योग्य हैं।

डॉ. पृथ्वीनाथ पाण्डेय- हमारा मन्तव्य यही है।

दीन बन्धु पाण्डेय- जो नाम-सूची आप ने दी है वे तो कुपुत्रों की श्रेणी में नहीं आते । उनकी माताएं कुमाता नहीं । उनकी माताओं ने अपने पुत्रों का अकल्याण नहीं
चाहा । कुपुत्र वह है जिसका आचरण कुमार्ग पर हो कुमाता वह है जो अपने पुत्र का अकल्याण सोचती व चाहती है ।

डॉ. पृथ्वीनाथ पाण्डेय- परन्तु उन माताओं के कर्मों के कारण ही तो उन पुत्रों को अपमानित होना पड़ा था। क्या आप उनके कर्मों के लिए समादृत करेंगे? कुन्ती के सामने ही कर्ण को कितना अपमानित होना पड़ा था! उसके बाद भी ‘माता’ कहने का अधिकार कुन्ती ने छीन लिया था। क्या यह ‘सुमाता’ का लक्षण है?

निशीथ जोशी- मां कुमाता हो सकती है यह विचार ही कुविचार है.. जिसने किसी को भी नौ माह गर्भ में रख कर जन्म दे दिया.. पहले उस ऋण से उॠण हो सके तब आगे बात बढे… वरना बिना मानव जन्म प्राप्त किये आत्मा भटकती रहती….जन्म के लिए कोई नारी किसी आत्मा को जीव के रूप में धारण कर लेती है यही जन्म जन्मांतरों के लिए सबसे बडा उपकार है आपको मेरे तर्कों से असहमत होने का पूरा अधिकार में.. यदि मेरी टिप्पणी से पीड़ा हो तो माफी चाहता हूँ.. पर मां कुमाता हो सकती है यह कुविचार मानव में ही जन्म ले सकता है किसी दूसरे प्राणि में नहीं..

डॉ. पृथ्वीनाथ पाण्डेय- नहीं सन्मित्र जोशी जी! आपके विचार-प्रतिविचार का स्वागत है। विचार के साथ विचार का संघर्षण होता है तब कहीं जाकर ‘द्युति’ (निष्कर्ष) उत्पन्न होती है। हम सभी सहभागी इसी उद्देश्य से यहाँ संवाद कर रहे हैं। नौ माह माँ को कष्ट होता है तो भ्रूण को भी होता है। कुछ तो लोक-लाज के भय से नौ माह से पहले ही गर्भ गिरवा लेती हैं; कुछ जन्म देकर अबोध-निष्पाप सन्तान को जंगल-झाड़ में फेंक आती हैं, जिन्हें जंगली जानवर खा डालते हैं। आये-दिन ऐसी घटनाएँ होती रहती हैं। ऐसे में आप ऐसी माताओं के लिए क्या कहना चाहेंगे?

दीन बन्धु पाण्डेय- उन पुत्रों को उनके महान कार्यों के फलस्वरूप उनके जीवन काल में और कल्पान्तर काल तक जो अप्रतिम सम्मान समाज से मिला और मिल भी रहा है वह उत्कर्ष पूर्ण है उनकी माताओं ने इसमें किसी प्रकार का व्यवधान नहीं डाला अतः वे माताएं कुमाता की श्रेणी में नहीं आयेंगी .

डॉ. पृथ्वीनाथ पाण्डेय– निरपराध कर्ण ‘सूतपुत्र’ का कलंक ढोता रहा; उसे गुरु तक नहीं मिला। विधवा ब्राह्मणी अपनी सन्तान कबीर को पैदा होने के शीघ्र पश्चात् लहरतारा ताल में क्यों छोड़ कर चली आयी? क्या यह सुमाता का लक्षण है?

निशीथ जोशी- सत्य वचन जो किसी भी आत्मा को जीव रूप में गर्भ में धारण कर शरीर धारी मानव को जन्म देती है उस ॠण से उबरना ही बहुत बडी तपस्या होगी तो वह कुमाता कदापि नहीं हो सकती…. वरना कबीर कहां से मिलते….. मां सिर्फ माँ होती है कोई बन कर देखे… वह पीड़ा, वह प्रेम, वह त्याग, वह तप….उस काल में भी व्यवस्था पर पुरुष का प्रभाव अधिक था आज भी परिभाषित वही कर रहा है… जिस पुरूष के कारण वह बच्चा पैदा हुआ उसको तो देव बना दिया गया. वाह से वाह क्या ढोंग रचा गया और जा रहा है.. सारा दोष प्रकृति का पुरूष तो विशुद्ध है…..

डॉ. पृथ्वीनाथ पाण्डेय- एकलव्य को कृष्ण के पितृव्य (चाचा) देवश्रवा का पुत्र कहा जाता है। विवरण मिलते हैं : वह जंगल में चला गया/ जंगल में उसे छोड़ दिया गया। वहाँ से एकलव्य को निषादराज हिरण्यधनु ने अपना पुत्र बना लिया। तब उसे एक नयी माता रानी सुलेखा मिलीं। यहाँ प्रश्न है, एक बच्चा जंगल कैसे पहुँच गया। उसकी वास्तविक माँ कौन थी? वास्तविक माँ मौन क्यों रही? यही कारण है कि एकलव्य अपने परिचय की तलाश में है : वह भीलपुत्र है अथवा शिकारी पुत्र अथवा कृष्ण के चाचा का पुत्र?

दीन बन्धु पाण्डेय- कोई उन्हें सुमाता कहे न कहे माता तो है ही । समाज को अनदेखा न करें । पुत्र स्नेह के कारण ही शिशु को जीवन मिला । वह माता कुमाता तो नहीं । मेरी दृष्टि से ।

डॉ. पृथ्वीनाथ पाण्डेय- श्रद्धेय! फिर पुत्र ‘कुपुत्र’ क्यों?

दीन बन्धु पाण्डेय- जो पुत्र करणीय कार्य न करके कुकृत्य करता है वह कुपुत्र होगा ।

डॉ. पृथ्वीनाथ पाण्डेय- और जो माता करणीय कार्य न करके कुकृत्य करती है, उसे आप क्या कहेंगे?

दीन बन्धु पाण्डेय- जो आप कह चुके हैं ।

डॉ. पृथ्वीनाथ पाण्डेय- अन्तत:, आपने उपर्युक्त सम्प्रेषण के निहितार्थ को स्वीकार करते हुए, हमारे इस परिसंवाद की आयु बढ़ा दी है।

डॉ. पृथ्वीनाथ पाण्डेय- बालक ध्रुव को अपने पिता उतानपाद की गोदी में खेलते हुए देखकर उसकी सौतेली माँ सुरुचि को इतना ईर्ष्या हुई कि उसने क्रूरतापूर्वक ध्रुव को गोदी से खींचकर बाहर कर दिया था। क्या ऐसी माता ‘सुमाता’ कहलायेगी? प्रमाण देना प्रारम्भ करूँगा तो पौराणिक और ऐतिहासिक ग्रन्थों में ऐसी ‘कुमाताएँ’ भरी हुई हैं।

राघवेन्द्र कुमार “राघव”- आदरणीय गुरुवर जो भी नारी जनने के बाद सन्तान का परित्याग करती है उसे उचित नहीं ठहराया जा सकता है । लेकिन परित्याग का कारण तो पुरूषों की हठधर्मिता और आसुरी व्यवहार है । कुन्ती को गाली और सूर्य को अर्घ्य, यह तो नारी को आदतन बुरा साबित करने की प्रवृत्ति है । क्या सन्तान केवल नारी की होती है, पुरुष का कोई दोष नहीं ? इतिहास साक्षी है कि कायरता सदैव पुरुष ने दिखाई है, नारी ने तो अनुगमन भर किया है ।

डॉ. पृथ्वीनाथ पाण्डेय- राघव जी! आप भी निहितार्थ से भटक रहे हैं। यहाँ इस बात पर मेरी आपत्ति है कि यदि पुत्र कुपुत्र हो सकता है तो माता ‘कुमाता’ क्यों नहीं हो सकती, इसलिए ‘विषयकेन्द्रित’ टिप्पणी करने की अपेक्षा की जाती है। यहाँ पिता अथवा अन्य कोई भी सम्बन्धी नहीं लाना है। इस आयोजन का उद्देश्य है, गूढ़ विषय पर विषयकेन्द्रित ‘बुद्धि-व्यायाम’ करना-कराना ताकि प्रासंगिक शब्द-सामर्थ्य का परिचय मिल सके।

“नारी ने तो अनुगमनभर किया है” इस वाक्य के प्रभाव को आपने नितान्त लघु रूप में देखा है।

राघवेन्द्र कुमार “राघव”- गुरुदेव माता कुमाता कैसे हो सकती है ? जितने भी उदाहरण हैं उनमें माता ने पुत्र के भविष्य को देखते हुए ही परित्याग जैसे कठोर निर्णय लिए । ऊपर की टिप्पणी में भी यही कहने की कोशिश की है कि माता दोषी कहाँ है ? आदरणीय जिस तरह आज गर्भपात किया जाता है उस समय भी व्यवस्थाएं रही होंगी । परन्तु किसी भी माँ ने गर्भस्थ को कत्ल नहीं किया अपितु जन्म दिया । लोकलाज और समाज की संकीर्ण सोच के चलते पुत्रों को त्यागने जैसे निर्णय लिए । कुन्ती ने कर्ण को त्यागने के साथ ही उसे स्वर्णाभरणों से लाद दिया था ताकि उसे पालने वाला उसे आराम से पाल सके । कुमाता भला प्रसव वेदना क्यों सहेगी गुरुदेव ?

डॉ. पृथ्वीनाथ पाण्डेय- राघव जी! कोई माता सद्य: प्रसूत सन्तान को अपार सम्पदा से लाद दे और उसे बेसहारा छोड़ दे, ऐसे में उस सम्पदा का वह क्या करेगा? दूसरा तो उस बच्चे की हत्या कर सारी सम्पदा ले उड़ेगा। मेरा मानना है, यदि कोई अविवाहिता-विवाहिता अवैध सन्तान पैदा करती है तो उसमें यदि मातृत्व है तो वह किसी भी स्थिति में उस सन्तान को अपने से अलग नहीं कर सकती। विशेषत: ऐसी ही महिलाएँ कभी ‘कुमाता’ नहीं होतीं।

जगन्नाथ शुक्ल- राघव सर ! माता कुन्ती ने पुत्र का त्याग लोक लाज वश किया, जिसमें पुत्र का कोई दोष नहीं था। वहाँ पर माता कुन्ती की विवशता समझ आ रही है किन्तु जब हस्तिनापुर में कर्ण का अपमान हो रहा था और बार-२ सूतपुत्र होने की ताड़ना दी जा रही थी, फिर भी माता कुन्ती का मातृजन्य व्याकुलता क्यों न फ़ट पड़ी? जब कर्ण बार-२ दुर्योधन के साथ मिलकर षड्यंत्र रच रहा था तब माता कुन्ती ने क्यों नहीं समझाया? कि अपने ही भ्राताओं के साथ यह कैसा छल?

डॉ. पृथ्वीनाथ पाण्डेय- ‘सूतपुत्र’ कहकर अर्जुन, भीमादिक कर्ण का बहुत अपमान करते थे और कुन्ती मौन बनी रहती थी।

राघवेन्द्र कुमार “राघव”- गुरुदेव मानता हूँ कि सन्तान का त्याग करना अनैतिक और अनुचित है और था । लेकिन त्याग का प्रश्न तब आया जब सन्तान ने दुनियाँ देखी । समाज कुलटा कह कर कुन्ती को और पाप कहकर कर्ण को मार देता । लेकिन कुन्ती ने दोनों को जीवित रखा । रही बात कर्ण के अपमान की, तो कुन्ती की विवशता को समझा जा सकता है । कुन्ती कुमाता होती यदि कुन्ती ने कर्ण को मार दिया होता । आदरणीय आपका कहना सर्वथा उचित है कि सम्पदा के लालच में कुछ भी हो सकता है, लेकिन समय और देश की भी अपनी मर्यादाएँ होती हैं । आज जब पाश्चात्य देशों में कोई पड़ोसी को जानने की ज़हमत नहीं उठाता, वहीं भारत में पड़ोसी को परिवार के सदस्य का दर्जा हासिल है । सम्भव है कि उस समय नैतिकता अब से अधिक रही हो । माँ देवकी ने अपनी छः सन्तानों का वध आँखों के सामने करवा डाला, परिस्थितियाँ ऐसी थीं तो क्या वह भी…

डॉ. पृथ्वीनाथ पाण्डेय- राघव जी! उत्तम टिप्पणी है परन्तु एक पक्षीय है। अब आप मारे गये भ्रूण और सन्तान तथा परित्याग किये गये, पग-पग पर अपमानित किये गये निरपराध-निरुपाय बच्चे के अभिवक्ता के रूप में अपनी इस गम्भीर टिप्पणी पर दृष्टि निक्षेपित कीजिए और तब अपने विपरीत सन्दर्भ में एक-दूसरी टिप्पणी करके देखिए।

डॉ. पृथ्वीनाथ पाण्डेय- आपने ऐसे प्रसंग और सन्दर्भ के कपाट अनावृत कर दिये हैं, जो अब इस परिसंवाद को और ऊँचाइयों पर ले जायेगा। इसके लिए आपका साधुवाद करता हूँ।

राघवेन्द्र कुमार “राघव”- मानता हूँ कि कर्ण के साथ जो हुआ वह ग़लत हुआ । और मैं कर्ण के प्रति अन्याय भी नहीं कर रहा । हाँ कुन्ती को अपराधिणी कहना भी हमें अनुचित प्रतीत होता है । गुरुदेव कुन्ती ने पुत्र का त्याग उसके पिता द्वारा उसकी रक्षा के वादे के साथ किया था । मैं आपकी इस बात से सहमत हूँ कि कुन्ती ने सही नहीं किया । लेकिन वह कुमाता भी नहीं है ।

डॉ. पृथ्वीनाथ पाण्डेय- यहाँ छ: सन्तानों के वध के लिए माता ‘कुमाता’ नहीं कहलायेगी क्योंकि देवकी के हाथों से उसके पति ने सन्तानों को छीनकर कंस को सौंपा था।

राघवेन्द्र कुमार “राघव”- आदरणीय ! विषय से इतर जा रहा हूँ क्षमा… माँ देवकी कुमाता नहीं है । लेकिन क्या वध होगा जानते हुए सन्तानोत्पत्ति सही निर्णय था !

डॉ. पृथ्वीनाथ पाण्डेय- आज जिस प्रकार से बिनब्याही माताएँ भ्रूणहत्या कर-करा रही हैं; जन्म देने के बाद जानवरों के हवाले कर दे रही हैं, उन्हें आप ‘कुमाता’ कहेंगे?

राघवेन्द्र कुमार “राघव”- आप हमें हमारी बातों में ही उलझा रहे हैं गुरु देव… हाँ मैं इन्हें कुमाता मानता हूँ ।

डॉ. पृथ्वीनाथ पाण्डेय- इसके पीछे अनेक अवान्तर कथा-अन्तर्कथाएँ हैं; इन्हें छोड़िए अन्यथा उलझते जायेंगे। इन सबका नाम उदाहरण के रूप में मैंने लिया है, जिनके आधार पर वर्तमान परिदृश्य को समझा जा सके।

डॉ. पृथ्वीनाथ पाण्डेय- बस राघव जी! आपने सच को स्वीकार कर इस परिसंवाद को पूर्णता प्रदान की।

राघवेन्द्र कुमार “राघव”- आख़िर में गुरुदेव यह ज़रूर कहना चाहूँगा कि औरत को कुमाता बनने पर हम पुरुष ही विवश करते आए हैं । हाँ सत्य यही है कि आदर्श केवल परमात्मा है । परिसंवाद के माध्यम से हम सबका ज्ञानवर्धन करने हेतु आभार । आपको कोटि-कोटि प्रणाम गुरुवर ।

डॉ. पृथ्वीनाथ पाण्डेय- राघव जी! प्रभावकारी टिप्पणी है परन्तु नारी भी उत्तरदायी है। उसे भी अपने विवेक का आश्रय लेना होगा।

राघवेन्द्र कुमार “राघव”- जी आप की बात से सहमत हूँ ।

आरती जायसवाल- सर! समाज का भय और समाज का नारी के प्रति एकांगी दृष्टिकोण,दृढ़ इच्छाशक्ति की कमी जिसके कारण चारित्रिक पतन और अपनी भूमिका तथा शिशु के लिए स्वयं के महत्व का सही ज्ञान न होने के कारण कुछ माता भी कुमाता हो सकती हैं।

डॉ. पृथ्वीनाथ पाण्डेय- हाँ आरती! जो भी महिला उक्त प्रकार के गर्हित कर्म करेगी, ‘कुमाता’ कहलायेगी।

आरती जायसवाल- हाँ। सर! माता को कुमाता बनाने वाले परिणाम से बचने हेतु सर्वप्रथम नारी का स्व भावनाओं पर नियंत्रण तथा बलात्कार का भरसक विरोध और सत्य उद्घाटन के साथ-साथ समाज का वैचारिक परिवर्तन अति आवश्यक है।

डॉ. पृथ्वीनाथ पाण्डेय- सार्थक टिप्पणी ।

आरती जायसवाल- आभार सर ।

डॉ. पृथ्वीनाथ पाण्डेय- सहभागीवृन्द!
अपने निष्कर्ष को एक बृहद् आकार देता हमारा परिसंवाद-कार्यक्रम यहीं पर पूर्ण विराम लेता है।
उपर्युक्त परिसंवाद की निष्पत्ति यह है कि यदि पुत्र कुपुत्र हो सकता है तो माता भी कुमाता हो सकती है। इसप्रकार एकपक्षीय समर्थन करनेवाला समाज यहाँ मिथ्या सिद्ध हुआ है।
समस्त सहभागियों के तार्किक क्षमता, प्रश्न-प्रतिप्रश्न तथा उत्तर-प्रत्युत्तर से हमारा यह बौद्धिक आयोजन अत्यन्त उन्नत रहा। आप सभी के प्रति हम कृतज्ञ हैं। आशा है, आसन्न आयोजन में भी आप सभी की ऐसी ही सकारात्मक और शालीन भागीदारी बनी रहेगी।