जीवन का आह्वान

आत्मीय पाठकगण !
मैं मानसिक स्तर पर घड़ी की गति से भी तीव्र गति में चलते रहने का पक्षधर रहा हूँ। विगत समय के कतिपय वर्षों में मैंने अपने सारस्वत कोश में भाँति-भाँति के इतने शब्द-सञ्चय कर लिये थे, जो हर किसी के लिए स्वप्नवत लगेगा। एक कालखण्ड वह भी रहा, जब मैं एक वर्ष में २७ से ३४ पुस्तकों का प्रणयन किया करता था, जो प्रकाशित भी होती थीं और अघोषित रूप में विश्व का एक अप्रतिम कीर्त्तिमान भी रहा है। सर्जन करने के लिए जब तत्पर होता था तब कल-कल, छल-छल निनादिनी-सदृश शब्द मुखरित होते थे; कथ्य-तथ्य-सत्य की गति-रति और मेरी मति देखते ही बनती थी। सब-के-सब मेरे समक्ष करबद्ध मुद्रा में खड़े रहते थे।

आज, जब मेरी आयु से एक वर्ष सरक चुका है तब अपनी सर्जनात्मक उपलब्धियों का मूल्यांकन करने बैठा हूँ। आत्म-मनन करने के उपरान्त निष्पत्ति के रूप में जो प्राप्ति होती है, वह हतप्रभ कर देनेवाली है। आज मेरी वही उपलब्धि शून्य से ‘शून्यतर’ है। यह मेरे लिए मंथन, चिन्तन, आलोचन तथा परीक्षण का विषय है।

हाँ, शिखर का संस्पर्श करने के लिए सीमातीत हठधर्मी हूँ। आत्म-प्रतीति को इतना प्रबल और शक्त (‘सशक्त’ अशुद्ध शब्द है।) बनाऊँगा कि कण्टकाकीर्ण और दुर्दान्त मार्ग भी मेरी कर्म-साधना के समक्ष नत-मस्तक दृष्टिगोचर होंगे। मैं जीवन का एक नया आह्वान प्राप्त करूँगा और नव लक्ष्य-संधान के प्रति प्रवृत्त हो जाऊँगा।

आप भी दोनों मुट्ठियों में संकल्प भर लें।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १ जुलाई, २०२१ ईसवी।)