कांटों से भरी नागफनी टांसिल का डाक्टर

आशीष सागर-


  •  माँ ने कहा तकलीफ में जैसे मै साथ हूँ वैसे ही साथ देगी !
  • ककड़ीले सीमेंटड जंगलो ने इसको भी विलुप्त किया

बाँदा – बुखार का आज पांचवा दिन है ! दवा ली गई पर बुखार नहीं उतरा. मन में शंका डेंगू की तरफ गई; जाँच कराई है देखिये क्या निकलता है ? पैरो में असहनीय टूटन में भी पंछैया की देशी दवा ने काम किया है ! अंग्रेजी दवा तो खा ही रहे है ! बीते सोमवार की शाम से गले में टांसिल सूज गए ! आज गला बढ़िया सूजा है ! माँ ने जब गला देखा तो कही ‘ कटीली नागफनी ‘ ले आओ ! जब जानकारी पूछी तो बोली पिछली दफा तुम्हारी भाभी को बाँधा था फिर नहीं हुआ ! मित्र गोपाल के साथ घर से दूर 10 किलोमीटर तिंदवारी बाईपास में गए तब ये मिली ! कभी न सोचे थे इसकी भी खोज में भटकना पड़ेगा ! मेरे घर से चंद कदम पर कभी भटकटईया ( लाल- सफ़ेद दोनों उसका फूल खांसी में काम आता था मकई के भुट्टे की अडिया की राख और शहद ) और ये नागफनी बेतरतीब मिलती थी आज विलुप्त होने को है ! वैसे इसको अर्काइव में सुरक्षित रखने के दिन है ! इसको आग में जलाकर काटे हटा दीजिये ! इसके दो भाग करिए और सरसों के तेल में हलकी हल्दी लगाकर गले में सूजन की जगह बांध लीजिये टांसिल सही होंगे ! कांटो से सजी इसकी देह में जो रस है वही टांसिल का इलाज है! ….जितना ये अभी सिकुड़ा है जलने पर फूल जायेगा ! ..आज रात आजमाने के बाद आगे….लगता तो है कि लोग नहीं मानेंगे विकास की भगदड़ से पर बोलना मज़बूरी है…एक दिन मरीज और आला डाक्टर ही रह जाने है !