डॉ० राघवेन्द्र कुमार राघव–
भोर का समय था। पूर्व दिशा में सूर्य की हल्की आभा प्रकट होने लगी थी। आश्रम के चारों ओर फैली निस्तब्धता धीरे-धीरे पक्षियों के कलरव से टूट रही थी। वृक्षों की पत्तियों पर ओस की बूँदें चमक रही थीं, मानो प्रकृति ने स्वयं ध्यान की मुद्रा धारण कर ली हो।
सुधांशु रात भर सो नहीं पाया था। आचार्य के शब्द उसके भीतर निरंतर गूंज रहे थे—
“तुम्हें उस व्यक्ति का सामना करना होगा… जो तुम्हारे जीवन में सबसे प्रिय है।”
वह सोच रहा था—
क्या यह कोई बाहरी व्यक्ति होगा?
या यह मेरे भीतर ही छिपा हुआ कोई भय, कोई मोह, कोई अहंकार है?
उसी समय आश्रम के शंख की ध्वनि हुई। यह संकेत था कि सभी शिष्य प्रातः सभा में उपस्थित हों।
सुधांशु भी सभा स्थल की ओर चल पड़ा।
आश्रम का प्रांगण विशाल था। बीच में एक पुराना वटवृक्ष था जिसकी जड़ें धरती को गहराई तक पकड़ती थीं। उसी वृक्ष के नीचे आचार्य पद्मनाभ का आसन था।
जब सभी शिष्य एकत्र हो गए, आचार्य धीरे-धीरे अपने आसन पर आए।
उनका मुख शांत था, किन्तु नेत्रों में आज एक विशेष गम्भीरता थी।
कुछ क्षण मौन रहा।
फिर उन्होंने कहा—
“वत्सो, साधना केवल मंत्र जपने का नाम नहीं है। साधना का अर्थ है—अपने भीतर के अंधकार से युद्ध करना।”
उन्होंने चारों ओर दृष्टि डाली।
“और इस युद्ध में सबसे कठिन शत्रु कोई बाहरी व्यक्ति नहीं होता… सबसे कठिन शत्रु हमारा अपना मन होता है।”
सुधांशु ध्यान से सुन रहा था।
आचार्य ने आगे कहा—
“आज से आश्रम में एक नई व्यवस्था आरम्भ होगी। यह व्यवस्था तुम्हारी साधना की परीक्षा है।”
एक शिष्य ने उत्सुकता से पूछा—
“गुरुदेव, कैसी परीक्षा?”
आचार्य ने शांत स्वर में कहा—
“मैं प्रत्येक शिष्य को ऐसी परिस्थिति में रखूँगा जहाँ उसे धर्म और मोह के बीच चुनाव करना पड़ेगा।”
सभा में हल्की हलचल हुई।
आचार्य ने कहा—
“याद रखो—जो साधक केवल ध्यान में शांत है, वह अभी अधूरा है। वास्तविक साधक वह है जो कठिन परिस्थितियों में भी धर्म का मार्ग नहीं छोड़ता।”
फिर उनकी दृष्टि सीधे सुधांशु पर ठहर गई।
“सुधांशु।”
सुधांशु तुरंत उठ खड़ा हुआ।
“जी गुरुदेव।”
आचार्य ने गम्भीर स्वर में कहा—
“तुम्हारी परीक्षा आज से आरम्भ होती है।”
सुधांशु के भीतर हल्की कम्पन हुई।
“आज्ञा दीजिए गुरुदेव।”
आचार्य कुछ क्षण मौन रहे।
फिर उन्होंने धीरे-धीरे कहा—
“तुम्हें आज ही अपने घर लौटना होगा।”
सुधांशु चौंक गया।
“घर…?”
“हाँ,” आचार्य बोले, “गृहस्थाश्रम ही तुम्हारी साधना का क्षेत्र है।”
सुधांशु के मन में अनेक प्रश्न उठने लगे।
“किन्तु गुरुदेव,” उसने कहा, “क्या आश्रम में रहकर साधना करना अधिक उचित नहीं होगा?”
आचार्य मुस्कराए।
“वत्स, यदि साधना केवल आश्रम की दीवारों के भीतर ही सम्भव हो, तो संसार का उद्धार कौन करेगा?”
फिर उनका स्वर गम्भीर हो गया—
“शिव केवल कैलाश में नहीं रहते। वे श्मशान में भी हैं, वन में भी हैं और गृहस्थ के जीवन में भी।”
सुधांशु चुप हो गया।
आचार्य ने आगे कहा—
“तुम्हें अपने घर लौटकर वही जीवन जीना होगा जो एक सामान्य गृहस्थ जीता है—परन्तु भीतर से जाग्रत रहकर।”
“किन्तु गुरुदेव,” सुधांशु बोला, “इसमें परीक्षा कहाँ है?”
आचार्य ने उसकी ओर गहरी दृष्टि से देखा।
“तुम्हारी परीक्षा यह है कि जब जीवन तुम्हें मोह, क्रोध और अहंकार के जाल में बाँधने का प्रयास करेगा—तब तुम धर्म का मार्ग नहीं छोड़ोगे।”
उन्होंने धीरे से कहा—
“और याद रखो—तुम्हारी सबसे कठिन परीक्षा तुम्हारे ही घर में तुम्हारी प्रतीक्षा कर रही है।”
सुधांशु का हृदय धड़क उठा।
“क्या आप संकेत कर सकते हैं गुरुदेव?”
आचार्य ने सिर हिलाया।
“नहीं वत्स। साधना का मार्ग यदि पहले ही स्पष्ट हो जाए, तो वह परीक्षा नहीं रह जाता।”
सभा समाप्त हो गई।
किन्तु सुधांशु का मन शांत नहीं था।
वह वटवृक्ष के नीचे खड़ा आकाश की ओर देख रहा था।
तभी उसके पीछे से आचार्य का स्वर आया—
“सुधांशु।”
वह तुरंत मुड़ा।
आचार्य उसके पास आकर खड़े हो गए।
“वत्स,” उन्होंने कहा, “क्या तुम्हें भय लग रहा है?”
सुधांशु ने कुछ क्षण सोचा।
फिर बोला—
“भय नहीं गुरुदेव… किन्तु एक अनिश्चितता है। मुझे नहीं पता कि आगे क्या होगा।”
आचार्य ने उसके कंधे पर हाथ रखा।
“यही तो साधना है।”
उन्होंने कहा—
“जो व्यक्ति भविष्य की पूरी योजना बनाकर चलता है, वह व्यापारी हो सकता है… साधक नहीं।”
सुधांशु ने पूछा—
“तो साधक कैसा होता है?”
आचार्य ने उत्तर दिया—
“साधक वह है जो अज्ञात मार्ग पर भी विश्वास के साथ चलता है।”
फिर उन्होंने गम्भीर स्वर में कहा—
“ध्रुव को भी नहीं पता था कि उसकी तपस्या का फल क्या होगा। प्रह्लाद को भी नहीं पता था कि भगवान किस रूप में उसकी रक्षा करेंगे। और मार्कण्डेय को भी नहीं पता था कि मृत्यु से उनका सामना कैसे होगा।”
उन्होंने धीरे से कहा—
“किन्तु तीनों में एक बात समान थी—अटल विश्वास।”
सुधांशु की आँखों में दृढ़ता आने लगी।
“गुरुदेव, मैं प्रयास करूँगा कि आपकी अपेक्षा पर खरा उतर सकूँ।”
आचार्य मुस्कराए।
“प्रयास मत करो वत्स… समर्पण करो।”
उन्होंने आकाश की ओर देखते हुए कहा—
“जब साधक पूरी तरह समर्पित हो जाता है, तब ईश्वर स्वयं उसकी साधना का मार्ग बना देते हैं।”
सूर्य अब पूरी तरह निकल आया था।
आश्रम की पगडंडी पर चलते हुए सुधांशु ने एक बार पीछे मुड़कर देखा।
आचार्य अभी भी वटवृक्ष के नीचे खड़े थे।
उनकी दृष्टि दूर कहीं क्षितिज पर टिकी थी।
और उस क्षण सुधांशु को लगा—
आचार्य केवल एक गुरु नहीं हैं।
वे एक ऐसे मार्गदर्शक हैं जो अपने शिष्यों को केवल ज्ञान नहीं देते…
बल्कि उन्हें जीवन की अग्नि में तपाकर शिवत्व की ओर ले जाते हैं।
किन्तु उसे यह नहीं पता था कि—
जिस परीक्षा की ओर वह जा रहा है,
वह उसके जीवन की दिशा ही बदल देने वाली है।