*मुक्त मीडिया का ‘आज’ का सम्पादकीय*
पृथ्वीनाथ पाण्डेय-
वर्तमान केन्द्र-सरकार का संचालन करनेवाले देश की जनता के सामने छ: वर्षों के भीतर जितने भी प्रकार के कार्य करने के लिए वचनबद्ध हुए थे, उनमें से एक भी आज तक पूरे नहीं किये हैं; बदले में भाँति-भाँति के शब्दों की जुगाली कर, देश में एक विषाक्त प्रकार का वशीकरण वातावरण बनाते आ रहे हैं, जिसे सोच-समझकर यही निष्कर्ष निकलता है, मदान्ध-रूप में दिखनेवाली पढ़ी-लिखी जनता भी ‘जड़मति’ दिख रही है। यही कारण है कि उसके सोच-विचार की सामर्थ्य कुन्द पड़ चुकी है।
आज सम्पूर्ण देश में जिस तरह का अधिनायकतन्त्र दिख रहा है, वह आनेवाले समय में देशवासियों के लिए बहुत ही ‘भारी’ पड़नेवाला है, देशवासी इसे ‘गाँठ’ बाँध लें। स्वास्थ्य, शिक्षा, परीक्षा, सेवा-नियोजन आदिक की कितनी दयनीय स्थिति है, इस दिशा में ‘बद्ध बौद्धिकता’ और ‘मानसिकता’ जाग्रत नहीं हो सकतीं; इसके लिए मुक्त चेत्ता रहकर दलविशेष राजनीति-सापेक्षता से स्वयं को पृथक् कर, राष्ट्रप्रियता के भाव को जाग्रत करना होगा।
जो लज्जाविहीन होते हैं, उन पर कुछ भी असर नहीं होता; वे स्वार्थ साधने के लिए किसी के भी ‘तलुए’ चाटने के लिए तत्पर रहते हैं, तभी तो ऐसे राजनेता ख़ुद को ‘गधे’ से प्रेरणा लेने का ज़ुम्ला फेंककर आज तक देश की जनता के सीने पर मूँग दलते आ रहे हैं।
शासन में रहते हुए राम को छला; गंगा, गो-गोशाला की गरिमा कलंकित की; हिन्दुओं को धतूरे का सेवन कराया; हिन्दू-हिन्दुत्व, मन्दिर आदिक को अपनी ‘बपौती’ मानते आ रहे हैं तथा जनमंगलकारी कार्यों को भुलाकर घिनौने आचरण का परिचय देते आ रहे हैं।
क्या ऐसे लोग में देश की सत्ता को धारण करने की क्षमता, योग्यता तथा सामर्थ्य है?
हमारे लिए सबसे पहले हमारा ‘राष्ट्र’ है; उसके विरुद्ध साज़िश रचकर ‘राष्ट्रधर्म’ नीलाम करनेवालों का हमें हर स्तर पर खुला विरोध करना होगा। सच तो यह है कि देश का राजनीतिक चरित्र इस स्तर तक ‘बलात्कारी’ और ‘व्यभिचारी’ हो चुका है कि अब यहाँ ‘लोकतन्त्र’ शासनपद्धति अप्रासंगिक हो चुकी है। जहाँ लोकतन्त्र की परिभाषा ‘राजनेता का, राजनेता के लिए तथा राजनेता के द्वारा’ व्यवहार में दिख रही हो वहाँ लोकतन्त्र की ‘शवयात्रा’ ही निकलेगी और अन्त्येष्टिक्रिया भी होगी। ऐसे में, अब संविधान में संशोधन कर, राजनेताओं को बाहर का रास्ता दिखाने के प्रयास में जुटना होगा। इसके लिए अब उन ‘विशुद्ध’ बुद्धिजीवियों को लोकसत्ता की होड़ में आना होगा, जो प्रत्येक स्तर पर और स्थिति में ग़लत को ‘ग़लत’ और सही को ‘सही’ कहते आ रहे हैं तथा किसी का तलुआ चाटने की होड़ में नहीं बने रहते।
(सर्वाधिकार सुरक्षित : पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १९ मार्च, २०२० ईसवी)