गूँज कलम की साहित्यिक संस्था की ओर से आयोजित हुई आशुलेखन प्रतियोगिता


पटना:- गूँज कलम की राष्ट्रीय साहित्यिक संस्था के मुख्य पटल के वाट्सएप समूह पर गत शनिवार की रात को 9 बजे से 10 बजे तक आशुलेखन प्रतियोगिता सम्पन्न हुई।

मुख्य संचालिका सुशी सक्सेना, इंदौर (मप्र)ने बताया कि प्रतियोगिता का विषय “गुस्सा/क्रोध” रखा गया था।देश के विभिन्न भागों से आये कवि/कवयित्रियों ने प्रदत्त विषय पर एक घंटे तक लेखनी चलाई।

संस्थापिका डॉ.स्नेह लता द्विवेदी,पटना(बिहार) से,मंच प्रभारी कृष्ण चतुर्वेदी, बूंदी (राज.)से तथा राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी डॉ.राजेश कुमार शर्मा, भवानी मंडी (झालावाड़)राज. से उपस्थित रहकर कवियों की लेखनी के तेवर देखते रहे।

माँ सरस्वती के माल्यार्पण,वंदना के पश्चात सर्वप्रथम ही डाॅ.कवि कुमार निर्मल, बेतिया (बिहार)ने “क्रोध की करो विदाई”शीर्षक से साप्ताहिक पारिवारिक मस्ती का रविवार के बहाने से अनोखा वर्णन किया….
“अपनों से गुफ्तगू -चुहल-प्यार करो।
आनंद करो,व्यर्थ क्रोध का त्याग करो।।”
इसी के तुरंत बाद कवयित्री पुष्पा निर्मल, बेतिया (बिहार)से लिखती है…
“गुस्से में सब भूल जाता प्राणी।
उसके बिगड़े होते फिर सब काम।।”

डॉ.जबरा राम कटारा, जालौर (राज.) ने “ज्यादा क्रोध नहीं काम का,ये घटवाता मान।”कहकर सुंदर रचना लिखी। युवा कवि पीयूष राजा ने नवादा, बिहार से ये कहकर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई…
“भाई-भाई के बीच संदेह का बीज उगाता है।
यह गुस्सा ही तो यहाँ स्वार्थ के कांटे फैलाता है।।”
विवेक दुबे,सागर मप्र से महाभारतकालीन दृश्यों को कविता में उभारकर गुस्से की अभिव्यक्ति देते है।नीति गुप्ता, लुधियाना (पंजाब)से कहती हैं…”क्रोध करने वाला मन से उतर जाता है।”

डॉ.सुमन मेहरोत्रा, मुजफ्फरपुर (बिहार) नाराजगी शीर्षक से सुंदर कविता गढ़ती है।आमिल कुरैशी, उत्तराखंड पारिवारिक जीवन में गुस्से को ढूंढ कर मनोहारी वर्णन करते हैं…
“गालो को फुला लेती है और चेहरे को टमाटर कर लेती है
लाडली मेरी गुस्से में पूरा घर अपने सर के ऊपर कर लेती है।।”
जुगल किशोर पुरोहित, बीकानेर “क्रोध काल का रूप सदा है,
आज से यह बात जान लो।।”
कविता के माध्यम से बेहतरीन संदेश समाज को देते है।नंद किशोर ‘बहुखंडी’देहरादून से क्रोध को रिश्तों को तार-तार करके दिलों में दूरियां पैदा करने वाला बताया। कवयित्री नीलम व्यास, जोधपुर से उपस्थित हुई। अतुकान्त में लिखी इनकी कविता देखिए…

“सुनो,
कभी उलझनों में फंसने पर कुछ बोल दूँ, सुना दूँ
तुम नाराज मत होना
नौकरी,, घर,, की व्यस्तता में,, तुम पर कभी खींज़ उठू,, तुम नाराज मत होना
मुझे संभाल लेना,, हमेशा की तरह,, मुझ अमर बेल को,, अपनी मजबूती का सहारा दे देना,,
जानते हों ना,,
बिन तुम्हारे मैं कुछ भी नहीं।।”

डॉ.शरद नारायण खरे, मंडला (मप्र)से क्रोध हरण के दोहे बहुत शानदार लिखते है…
“संयम से ही नित खिले ,उजली पावन धूप।”
कवयित्री हेमलता भारद्वाज लिखती है…”गुस्से में प्राणी सुध-बुध खो देता है”
डॉ.मधुसूदन तिवारी,मंडला, मप्र और सरोज कंवर शेखावत, जयपुर ने भी शानदार प्रदर्शन किया।