
(प्रख्यात भाषाविद्-समीक्षक)
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
पिछले सवा चार वर्षों में देश की वास्तविक आर्थिक विकास की कितनी दुर्गति हुई है, इस पर तटस्थ रहकर अब विचार करने की आवश्यकता है। १ डॉलर = लगभग ७१ रुपये का मतलब आप और आपके अन्तर्हित-अज्ञातवासी वित्तमन्त्री समझते हैं। प्रधानमन्त्री के रूप में आपकी अभी तक आँखें मूँदी हुई हैं; आयात-निर्यातनीति में कहीं-कोई सन्तुलन नहीं है; आर्थिक विकास-दर की गति अति शोचनीय स्थिति में है; शासकीय नियोजन के विषय में आपकी सरकार “ख़ाली डिब्बा-ख़ाली बोतल” दिख रही है; नारी-सम्मान, देश का किसान, शिक्षित-अर्द्धशिक्षित बेरोज़गार, देश की सीमाएँ, “जायें तो जायें कहाँ” की स्थिति में जी रही हैं; किन्तु इन सभी सन्दर्भों में आपकी और आपके मुख्यमन्त्रियों की खुली आँखें इन अनियमितताओं को देखकर भी देख नहीं पा रही हैं, जबकि स्वार्थ-सन्दर्भ में सबकी आँखें खुली हुई हैं। इन्हीं सब कारणों से आपके और आपके अनुचरों-परिचरों के प्रति विश्वास दम तोड़ रहा है। ५० वर्षों तक शासन करते रहने का मोह और लोभ आपके आचरण की सभ्यता को कितना गिराता रहेगा, आपको इसका बोध है अथवा नहीं; परन्तु अपने कुकर्त्तव्य के स्तर पर देश के मतदाताओं को आप सभी ने इतना कुछ दिखा-समझा दिया है कि अब देश के औसत मतदाताओं ने ‘भारतीय जनता पार्टी’ की क़ब्र खोदने के लिए ‘अमोघ कुल्हाड़ी’ की व्यवस्था कर ली है और दो ग़ज ज़मीन की; मणिकर्णिका घाट पर ‘बेहया की सूखी लकड़ियाँ’ सजाकर रख दी गयी हैं, जिनपर जले हुए ‘मोबाइल ऑयल’ का छिड़काव भी कर दिया गया है।
पिछले सवा चार वर्षों से जनसामान्य तीव्र गति में आपकी बन्द आँखों के परिणाम का भुगतान करता आ रहा है। ग़रीबी, महँगाई, हिन्दू-मुसलमान की राजनीति, रोडशो, आत्मप्रदर्शन, आत्मविज्ञापन, विदेशभ्रमण, एक राष्ट्र-एक कर (जी०एस०टी०) नोटबन्दी, आधार कार्ड, लोकघाती बैंकिंग व्यवस्था, केन्द्रीय जनहित-योजनाओं आदिक की भूल-भुलय्या में आप कब तक देश की जनता को फँसाते रहेंगे? एक सामान्य से विशिष्ट व्यक्ति तक आपके शासनकाल में कितना असुरक्षित अनुभव कर रहा है, कभी जागरूक बनकर आपने इसका संज्ञान लेने का प्रयास तक भी किया है? आपकी प्रथम प्राथमिकता है, आपका साम्राज्य निष्कण्टक बना रहे, भले ही उसके लिए आपको किसी भी ‘गर्हित सीमा’ तक जाना पड़े।
कभी बन्द कक्ष में शान्तिपूर्वक बैठकर आपने इस विषय पर आत्मपरीक्षण किया है— मैं कितना प्रपंची-पाखण्डी प्रधान मन्त्री हूँ, जिसने पूरी तरह से आँखें खोलकर भोली-भाली जनता को एक नहीं, बल्कि ‘सैकड़ों’ की संख्या में, मुक्त जनसभाओं में मोहक आश्वासन दिये थे तथा बाँहें भाँजकर और छप्पन इंच सीना में कार्बन- हाइड्रोक्लोरिक गैस भरकर उछाल मारते हुए, वीर और रौद्ररस में लोकमंगलकारी घोषणाएँ की थीं, जो बदबूदार “बीरबल की खिचड़ी” को चरितार्थ कर रही हैं।
आरक्षण, प्रतिआरक्षण, अनुसूचित जाति-अनुसूचित जनजाति अधिनियम’ की “डंके की चोट पर” व्यवस्था कराकर जिस ‘सामाजिक समरसता’ में आपने ‘गरल’ डालकर हमारे सौमनस्य के साथ बलप्रयोग करते हुए, सार्वजनिक वैमनस्य का वातावरण बनाया/बनवाया है, वह ‘भारत के राजनीतिक इतिहास’ में ‘कालिमामय अपूर्व अध्याय’ के रूप में ‘बेचैन अपराधी’ की तरह से फड़फड़ाता रहेगा।
मत भूलिए नरेन्द्र मोदी! आप कोई भाग्यविधाता नहीं हैं; आप भी उन्हीं याचकों में से एक हैं, जो निर्वाचन के समय घुटनों के बल रेंगते हुए, असहाय की भाँति उन्हीं लोग तक पहुँचते हैं, जिनकी भावनाओं-संवेदनाओं के साथ आप अब तक क्रूर छल-कपट करते आ रहे हैं।
आज देश का निम्न और मध्य-वर्ग आपके शासनकाल में कितना त्रस्त है, कभी आपकी शुष्क संवेदना इस दिशा में रसमय बन सकी? आसाराम, राम रहीम आदिक के पाप के घड़े कब और कैसे भर गये और उसका परिणाम और प्रभाव कितने व्यापक रूप में प्रकट हो गया, आपने भी नहीं सोचा होगा। राजनीतिक माफ़ियाओं के भी पाप का घड़ा भरता है। समय की प्रतीक्षा है। मत भूलिए, आनेवाले चुनावों में मतदाताओं के प्रतिकार-प्रतिशोध की क्रान्तिकारिक अनुगूँज संसद् की दीवारों में दरार पैदा कर देगी।
(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, इलाहाबाद; १ सितम्बर, २०१८ ईसवी)