— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
वक़्त-बेवक़्त की स्याह परछाइयाँ
चुपके से दाख़िल होती हैं
मेरे अँधेरे घर में।
अट्टालिकाओं के भार से
लहूलुहान नीवँ
कब दम तोड़ देगी,
इसे वक़्त भी नहीं जानता;
क्योंकि वह जी रहा होता है,
अपना वर्तमान।
बेवक़्त तो एक अनाहूत अतिथि है,
जो हमारी नसों और शिराओं में
संचरित होते रक्त-प्रवाह को
अवरुद्ध कर देता है।
(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ५ अगस्त, २०२० ईसवी।)