तथाकथित शब्दप्रयोग ‘बेस्ट सेलर बुक’ के नाम पर कब तक छलावा होता रहेगा?

● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

इस पुस्तक को शुद्ध हिन्दी का बोध करानेवाली ‘सर्वोत्तम’ पुस्तक बताया जा रहा है। सम्भवत: आप सभी मे से कुछ ने इस पुस्तक के आवरणपृष्ठ पर दृष्टिपात किये होंगे; परन्तु अधूरे मन से।

हमने भी इस ओर दृष्टिनिक्षेपण किये हैं।

अब आप सभी ध्यानपूर्वक हमारे परीक्षण और समीक्षण को देखें, समझें तथा अनुभव करें।

इस पुस्तक का आवरणपृष्ठ’ पूरी तरह से अशुद्ध है।

● पीले रंग के वृत्त मे दिख रहे ‘हिंदी प्रयोग’ के स्थान पर ‘हिन्दीप्रयोग’/’हिन्दी-प्रयोग’/ ‘हिन्दी का प्रयोग’ होना चाहिए। ‘हिंदी प्रयोग’/’हिन्दी प्रयोग का कोई अर्थ नहीं होता; क्योंकि दोनो शब्दों मे पार्थक्य है। ‘हिन्दी-प्रयोग’ तो व्यापक शब्द है। यहाँ ‘हिन्दीभाषा-प्रयोग’/’हिन्दीशब्द-प्रयोग’ होगा, जो कि नहीं है।
● अब पुस्तकनाम को देखें। ‘माषा संशय-शोधन’ निरर्थक शीर्षक है। ‘भाषा’ के ‘भ’ को ‘म’ बना दिया गया है। यदि थोड़ी देर के लिए हम ‘माषा’ को ‘भाषा’ मान भी लेते हैं तो भी इस पूरे शीर्षक से किसी अर्थ का बोध नहीं होता। इसे यदि ‘भाषा : संशय-शोधन’ लिखा जाता तो कहीं इसका अर्थ प्रकट होता।
● ‘संशय’ के ‘स’ के ऊपर ० (शून्य) के स्थान पर बिन्दी (सं) लगती है :– ‘संशय’। हिन्दी-व्याकरण के अन्तर्गत किसी भी अक्षर के ऊपर अनुस्वार और अनुनासिक ध्वनि का बोध कराने के लिए बिन्दी (ं) और चन्द्रबिन्दु (ँ) का व्यवहार किया जाता है, शून्य (०) का कदापि नहीं।
● ‘शोधन’ के स्थान पर ‘शोघन’ दिख रहा है, जो निरर्थक शब्द है। यहाँ ‘ध’ पर पूरी तरह से शिरोरेखा खींचकर कर उसे ‘घ’ बना दिया गया है।
● ‘वाचिक-अशुद्धियाँ’ के स्थान पर ‘वाचिक अशुद्धियाँ’; ‘भाषा-विज्ञान पर्याय’ के स्थान पर ‘भाषाविज्ञानपर्याय’/’भाषाविज्ञान-पर्याय’/ ‘भाषाविज्ञान का पर्याय’/’भाषा-विज्ञान का पर्याय’; अर्थपरक-विभेद’ के स्थान पर ‘अर्थपरक विभेद’ तथा ‘धातु व्युत्पत्ति’ के स्थान पर ‘धातुव्युत्पत्ति’/ ‘धातु-व्युत्पत्ति’/ ‘धातु की व्युत्पत्ति’ होगा।
● ‘मूलार्थ’ शब्द का व्यवहार पाठक-पाठिकाओं को भ्रमित कर रहा है; क्योंकि यह सुस्पष्ट नहीं है कि किसका ‘मूलार्थ’ है। यदि वहाँ ‘निष्पत्ति’ का प्रयोग हुआ रहता तब शब्दप्रयोग की सार्थकता समझ मे आती।
● आश्चर्य है! इस पुस्तक का लेखक इन अशुद्धियों को नकार रहा है। ऐसे मे, यह पुस्तक निश्चित रूप से अशुद्धियों से भरपूर होगी; क्योंकि शुद्ध हिन्दीशब्द-लेखन ‘हस्तामलक’ नहीं है।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १ अक्तूबर, २०२२ ईसवी।)