— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
कराहता-सिसकता वतन देखो!
घर-घर का उजड़ा चमन देखो!
सिर चढ़कर बोलती बेशर्मी है,
पर्द:नशीं का यह चलन देखो!
शेर मानिन्द देश अब गुर्राता नहीं,
ज़िन्दा लाश ओढ़े कफ़न देखो!
मुल्क तबाह कर कुछ इठला रहे,
हैरत है, अवाम का सहन देखो!
शर्मसार करती हर नाकामी है,
आँखें खोलो और मरन देखो!
(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १९ मई, २०२० ईसवी)