आवृष्टि से आक्रान्त लोक-आर्त स्वर

— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

एक–
जीवन अब मझधार में, नदी-पार है गाँव।
नहीं सहारा दिख रहा, नहीं है कोई ठाँव।।
दो–
आश्वासन हर रोज़ का, मृत्यु दिखाती आँख।
साहस उड़ पाता नहीं, क़तर दिया है पाँख।।
तीन–
चिपकी तन सन्तान है, वस्त्रविहीन है माँ।
मन का क्रन्दन हर तरफ़, जान से निकले जाँ।।
चार–
रोटी-रोटी माँग कर, बिखर रही है आस।
आता दिखता है नहीं, कोई अपने पास।।
पाँच–
दे राहत के नाम पर, लूट रही सरकार।
लज्जा आती है नहीं, नहिं कोई दरकार।।
(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १२ अगस्त, २०२० ईसवी।)