डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय-

(प्रख्यात भाषाविद्-समीक्षक)
एक
—–पाप-बोध—-
पाप का कण-कण
मेरी जिह्वा से टकराता है
और ले जाता है–
एक ऐसे गह्वर में,
जहाँ पुण्य का प्रताप
आन्दोलित हो रहा है
और मेरा पाप
सिर चढ़ कर बोल रहा है।
दो
——मेरी चित्रलेखा—–
मेरी चित्रलेखा की खिलखिलाहट
मुझे निमंत्रण दे रही है–
अज्ञात प्यास-कुण्ड में
निमग्न हो जाने के लिए।
सम्मोहक शक्ति के
संस्पर्श और संघर्षण
मेरी देह के आचरण की
पट-कथा लिख रहे हैं
और मैं सूत्रधार के रूप में
अपनी ही पराजय की
पृष्ठभूमि सुना रहा हूँ।
(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, इलाहाबाद; १५ जुलाई, २०१८ ईसवी)