— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
तू बूझ भा जनि बूझ, अब छोड़ि द ओकरा के,
हम बूझनी सरसन्त से, तू बुझल जेकरा के।
गली-गली कुकुरात रह, अब ठेकी ना कुछू,
लोग थपरी बजइहें, बोली बोल जोकरा के।
लुकाइ के मोबइलवा बबुनी खिसकि लीहली,
ओढ़नी सरकाई छुपाइ के देखली छोकरा के।
अब उफर पड़लि जमीदारी, मुड़ाइ ल गोंछिया,
सलाम ठोके के परी तहरा, अब उहे नोकरा के।
जुग-जमाना बुढ़ाई के, अब करियाह हो गइल बा,
सगरो देहिया में सबुनिया, लगावे के परी ओकरा के।
गाइ-भइंस-बकरी के खाये के, कवनो ठेकान नइखे,
तहरा पाले के परी अब ओही आवारा बोकरा के।
(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ; १० जुलाई, २०२० ईसवी)