टूटती है रसोई

ज़ैतून ज़िया –

जब होती है कोई तलाक
तो दो लोग नहीं टूटते
टूटती है रसोई भी
नमक,चीनी, मिर्च, हल्दी
भर लिया जाता है पन्नी में
डब्बे खाली हो जाते है
इलायची, लौंग और जीरे के
धीमी आंच पर जो प्रेम पका था
तेज़ आंच पे जल गया
पर्त मोटी है कालिख की
दिल पे भी
कड़ाही पर भी
देखो मांजने से जाएगी नहीं 
अब कोशिश बेकार है !!

दाल, आटा, चावल
सब बटोर के
कनस्तर खाली किये जाते है
गाड़ी पर चढ़ाने को
छः कप में से बचे चार कप
वापस रखे जाते है डब्बे में
संभाल कर उठाया जाता है
कांच की तश्तरियों का सेट
कागज लगा कर
वापस गत्ते में भर लिया जाता है
कांच के गिलास सँभालने में
टूट जाता है वो एक कॉफ़ी मग
जिसपे बना था दिल
और मग के साथ
दिल भी चटख के टूट गया !!!