शरदेन्दु मिश्र ‘राहुल’ बघौली
मैं समाज का दर्पण हूं,
अभिव्यक्तियो का वर्णन हू ।
सुख दुख का मैं मिश्रण हू,
हा मैं मौलिकता का चंदन हू।।
हमने देखे है कुछ विकास
पर अधिकता में विनाश।
कलम चली तो ये बोले
कुछ न लिख पाया तो वो बोले।।
मेरी कलम चली है कुछ अंधियारो के वर्णन पर।
कही चली है राजमुकुट के आगे तन कर अड़ने पर।।
पुलिस प्रशासन नेता मंत्री कोई न हम से छूटा है।
फिर भी देखो बडा़ सा तबका हम से टूटा है ।।
हमने लिखी है आगे बढ़ कर सब समाज की सच्चाई।
अच्छा करने वालो की लिखी है हमने अच्छाई ।।
बारह बरस के कार्यकाल में हमने न किसी का विरोध लिखा ।
जिसको लिखा लिखा मैने बस सादर व अनुरोध लिखा।।
“परदेशी” का अनुज शिष्य “राहुल” मैं कहलाता हूं ।
लाड़ दुलार पाकर मैं मन ही मन हरषाता हूं।।
आज आदरणीय सुधीर अवस्थी ‘परदेशी’ के जन्मदिन व हिन्दी पत्रकारिता दिवस पर शरदेन्दु मिश्र ‘राहुल’ बघौली द्वारा लिखित पहली काव्य रचना ।