समयानुकूल उद्गार : राजू नहीं अकेला जग में

☆★ एक गीत★☆

जगन्नाथ शुक्ल…✍️ (प्रयागराज)

बी०ए० कर के, भैंस चराते, अक़्सर अपना सिर धुनता है;
राजू नहीं अकेला जग में, क़िस्मत से जो लड़ पड़ता है।

दो बीघे की बड़ी किसानी,
दो बैलों के चले सहारे।
मारकीन की चड्ढी पहने,
रहता ऊपर बदन उघारे।

साल-अन्त परिणाम जो आते,रहता सूची में वो आगे;
बैठा पीछे की टेबल में,हक़ के लिए झगड़ पड़ता है।

राजू नहीं अकेला…………………..

कैसे भी हो कॉलेज ऊपर,
पढ़ने की वो ज़िद करता है।
बैल बेंच कर बेबस बापू,
ज़िद उसकी पूरी करता है।

पहली पंगत में जेवँन का, पुश्तों का हर्ज़ाना बाक़ी;
लेकिन लिए आय की पर्ची,शुल्क प्राप्ति को अड़ पड़ता है।

राजू नहीं अकेला…………………..

प्रभावती की आँखों में,
जाने कितने अरमान सो रहे?
राजकुँवर के दामन में ,
बहुतेरे एहसान बो रहे।

वर्षों बीते तैयारी में, क़िस्मत फिर भी ना बदल सका;
मिट्टी का घर ढहता जब ,ग़ुरबत का मेघ अकड़ पड़ता है।

राजू नहीं अकेला…………………..