ज़ाहिर अब हर सम्त है, ज़ालिम है सरकार

— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

एक–
मन में बैठा चोर है, नहीं कहीं है ठौर।
जनता-गठरी काटते, चोरों का है दौर।।
दो–
नाग विषैला दिख रहा, जड़ी बनी निरुपाय।
लौट सँपेरे अब रहे, दिखता नहीं उपाय।।
तीन–
पानी-पानी हो रहे, यहाँ-वहाँ हैं भाग।
जनगणमन से कट रहे, देश लगायें आग।।
चार–
खरबूजा शरमा रहा, तरबूजा भी साथ।
ऐंठ रही ककड़ी यहाँ, भिण्डी पकड़े माथ।।
पाँच–
शर्म-हया सब पी गये, तनिक नहीं है लाज।
हाल यहाँ का अजब है, कोढ़ी को हो खाज।।
छ:–
दिखता ख़ाके मुर्द:१ है, नहिं दिखता दरकार।
ज़ाहिर अब हर सम्त है, ज़ालिम है सरकार।।
★ शब्दार्थ– १बंजर।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज २९ अगस्त, २०२० ईसवी।)