स्रष्टा! अब तो करो संहार

● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

एक–
भ्रष्ट यहाँ का तन्त्र है, भ्रष्ट नियामक लोग।
धर्म खा रहा देश को, राजा करता भोग।।
दो–
अधम-नराधम दिख रहा, ले चण्डाली रूप।
गिरता-गिरता आ रहा, कुत्सित-कलुषित भूप।।
तीन–
दुखड़ा दुर्बल हो रहा, पककर पकता कान।
ख़ून सूखता रोज़ है, हर पल जाती जान।।
चार–
स्रष्टा! जन-जन रो रहा, अब तो करो प्रहार।
रावण-सा मनबढ़ दिखे, बढ़कर करो संहार।।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २३ जुलाई, २०२२ ईसवी।)