प्रदीप कुमार तिवारी, करौंदी कला, सुलतानपुर 7537807761गिरती है सीमा पर लाशें
चैन से हम तुम सोतें हैं।
भूख से व्याकुल बच्चे उस दिन,
सैनिक के घर रोते हैं।।
हम शहीद कह के उनको,
काम आपना कर लेते।
कोई उन माओं से पूछो,
लाल जो अपना खोते हैं।।

बाबा की लाठी बनकर,
जिस बच्चे को चलाना था।
बूढ़े होते बापू का, जिसको-
सहारा बनना था।।
आज उठाकर लायें हैं,
कंधे पर उसको चार जवान।
चला जलने बापू उसको,
जिसके हाथ ही जलना था।।
सिसक रही है जो पगली,
उसे साजन संग चहकना था।
आया है सांवरियाँ उसका,
उसे तो भटकन था।।
ऐसे में कुछ गद्दारों नें,
आज आवाज उठाया है।
मजहब के उन्मादी नें,
गीत हिन्द ठुकराया है।।
नहीं तिरंगा लहरेगा,
मस्जिद के प्राचीरों से।
जयचंदों की सेना ने,
सहमति शीश झुकाया है।।
शर्म तनिक ना आई उनको,
गद्दारी जो कर बैठे।
एक अकेले सैनिक पर जी,
चार चपाटें जड़ बैठे।।
ध्यान खूब है शृगालों को,
सिंहों के हाथ बंधें।
इसी लिए ये पत्थरबाज,
कर्म नाजायज कर बैठे।।