● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
काल के कपोलों पर,
अप्रत्याशित शैली मे
जैसे ही मैने अधरों से हस्ताक्षर किये,
वह संन्यस्त-सा भाव लिये बोला,
“तुमने भेद जिया का क्यों खोला?”
मेरा मन भोला, कुछ नहीं बोला।
(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ४ नवम्बर, २०२२ ईसवी।)