आज कौन बुद्ध है,
आत्मा से शुद्ध है।
हर कोई प्रबुद्ध है,
युद्ध ही युद्ध है।
हर तरफ प्रवंचना,
भंग साधु-साधना।
भ्रांतियों के चित्र हैं,
कुदृष्टि की भावना।
विचित्र मित्र बन्धुता,
स्वाभिमान क्रुद्ध है।
युद्ध ही युद्ध है….
साधुता निरीह है,
दासता सहीह है।
शहर चकाचौंध हैं,
परेशान डीह है।
नौज़वान क्षुब्ध है,
मार्ग पूर्ण रुद्ध है।
युद्ध ही युद्ध है….
खेत सड़क बन गये,
रेत – महल तन गये।
जठराग्नि है ज्वलन्त,
लूटने कफ़न गये।
मनगढ़ंत यशस्विता,
मनस्विता विरुद्ध है।
युद्ध ही युद्ध है…

©जगन्नाथ शुक्ल…✍️
(प्रयागराज)