गुड नाईट…टू यू

उसकी नाईट क्या गुड होगी,
जिसको नींद नहीं आती ।
विश्लेषण करते- करते,
व्यग्र यामिनी कर जाती ।।

प्रात- उषा आलस भर देती,
पथ पर भी चलना होता ।
‘मूरख हिरदय’ तभी जागता,
जब सब दुनिया सो जाती ।।

नील गगन का अर्ध चन्द्रमा,
अपने पास बुलाता है ।
कैसे पास पहुँच मैं पाऊँ,
आधा चिन्तन तेरा है ।

परियाँ लातीं उड़न खटोला,
तुम तक मुझको पहुँचाती ।
उषा- नेत्र खुलने के पहले,
अपना, उड़न खटोला ले जातीं ।।

स्वप्नों की दुनिया में हम तुम,
सारी रात विचरते रहते ।
अपने देश को परियाँ मुझको,
कभी नहीं हैं ले जाती ।।

एक रात के लिये, परियों से,
उड़न खटोला माँगूंगा ।
अपने साथ बिठाकर तुमको,
दूर देश उड़ जाऊँगा ।।

वहाँ जहाँ से सूर्य गुलाबी,
आभा के संग छिपता है ।
नभचुम्बी, निडर हिमालय,
सदा मौनव्रत रखता है ।।

रंग बिरंगे फूलों से…..,
जहाँ घाटियाँ लदती हैं ।
चटकीले रंगों वाली जहाँ,
तितलियाँ नचती हैं ।।

झरने जहाँ पूर्णमासी को,
नर्तन- नाद दिखाते हैं ।
हिमनद ,जलधाराओं से मिलकर,
गीत प्रणय के गाते हैं ।।

और अमावस चन्द्र जिस,
अज्ञात जगह छिप जाता है ।
मगर पूर्णिमा के दिन वह,
सागर को पास बुलाता है ।

अन्तरिक्ष के जगमग दीपक
सारी रात जगाते हैं ।
आओ, देखो दृश्य मनोरमा,
हम सबको नहीं बुलाते हैं ।

उत्सव का आनन्द मनेगा,
राग-माधुरी गाऊँगा ।
उषा काल से पहले, परियों का,
उड़न खटोला लौटाऊँगा ।।

प्रातः सबके सम्मुख हम तुम,
इन घटनाओं को दोहराएंगे ।
हमे ले चलो, हमे ले चलो,
सबके सब ललचायेंगे ।।

अवधेश कुमार शुक्ला ‘मूरख हिरदय’, हिन्दी दिवस, आश्विन द्वादशी, कृष्ण, 14 सिंतबर 2020