है निशि-दिवा-सी घूमती सर्वत्र विपदा-सम्पदा

एक–
साथ-साथ चलता रहा, वर्ष-हुआ अवसान।
मन-मंथन मथता रहा, कहाँ मान-अपमान?
दो–
घूँघट काढ़े मौन है, अवगुण्ठन-सी देह।
सहमे-सकुचे धर रहे, पाँव-पाँव अब गेह।।
तीन–
मलय मन्द मुसकान ले, बढ़े जोश के साथ।
जन-जन अगवानी करे, झुका-झुका कर माथ।।
चार–
यश-अपयश हर हाथ मे, हानि-लाभ है साथ।
दान करो कुछ इस तरह, हाथ दिखे बस हाथ।।
पाँच–
मौसम हरजाई बहुत, चुगली आँखें खेल।
मनमन्दिर मंगल मही१, मुग्ध मुदित मन-मेल।।
छ: –
कंकड़ कंकण२ कंधनी३,कटितट४ कोमल-रूप।
कलित५ केश कलबल६ मना, क्रियाकलाप अनूप७।।
सात–
मंगल दंगल दिख रहा, शुभ की चमड़ी छील।
चहुँ दिशि हाहाकार है, उत्तर टाँके कील।।
आठ–
सत्ता भूख अनन्त है, कर्म मेटता रेख।
गति मति दिखती वाम है, मन-मानस पर मेख८।।
नौ–
सच मिथ्या के गोद मे, अनावरण है भेद।
गर्त जा रही वृत्ति है, सौ-सौ दिखते छेद।।
दस–
जग है मिथ्या मान लो, ब्रह्म नहीं है खेल।
आपस का संताप हर, हर से कर ले मेल।।
ग्यारह–
कलिका चटकी रातभर, चाहत बनना फूल।
साधक साधन रह गया, हृदय उठ रहे शूल।।

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शब्दार्थ :–

१धरती २कंगन ३करधनी ४नितम्ब (कमर का पिछला भाग) ५सुसज्जित ६छल-कपट ७बेजोड़ ८कील।

सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १ जनवरी, २०२४ ईसवी।)