नेहा द्विवेदी-
हे चिर महान
भारत की शान मानवता के अविचल प्रहरी।
युग-युग से हो तुम अचल खडे़
तुमको पग भर न डिगा सके
तूफां जो आये बड़े-बड़े
हे सत्यब्रती, संघर्षरती हे वैरागी, योगी तपसी
तुम शांत धीर हो तृप्त सदा
पर कितना करुण विशाल हृदय
हरने को जन जीवन की तृषा
नदियों में और निर्झरों में
मूकता व्यथा बनकर निकली ।
तुम हो अखंडता के प्रतीक
धात्री समान दुःख सहकर
पाली महान संस्कृति पुनीत
संसार में फहराई तुमने
शुचिता, समता की ध्वजा नई ।
विश्व विदित तव स्वाभिमान
नहीं झुका कभी विपदाओं में
सर्व स्वदान कर जिये अभावों में
यदि ईश नीर तुम न देते
मरुथल होती सारी जगती ।
चिडि़यों की चहक, पुष्पों की महक
स्वर्णिम रवि किरणें पड़तीं
निर्झरों की ध्वनि कल-कल करती
इतनी मोहकता होकर भी
रखते विराग सौंदर्यपती ।
हे चिर महान
भारत की शान मानवता के अविचल प्रहरी ॥