(एक)
जंगल का क़ानून
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जंगल का मिजाज़,
बेख़ौफ़, आवारा-सी दिखती हवा के इर्द-गिर्द
सिमटकर रह गया है।
कल तक जो जंगली पेड़ों के पत्ते हिलते थे; सरसराते थे,
अब चुप, मौन, डरे-डरे, सहमे दिख रहे हैं।
ख़ून खौलाता दहाड़ सुनो!
उस मक्कार-शातिर जंगली भेंड़िये की,
जो शेर की खाल ओढ़
जंगल के निरीह पशुओं, जन्तुओं तथा पक्षियों को
ख़ूनी आँखें दिखाता आ रहा है।
नख-शिख ख़ून से सना राजा दिखता भेंड़िया,
जंगल के वास्तविक राजा के विरुद्ध
षड्यन्त्र रचाकर छद्म राजा बन बैठा है।
गैंडे, मगर-मच्छ, सियारों, गिद्धों तथा उल्लुओं को,
अपना सिपहसालार और जासूस बना;
हाथी, शेर, बाघ, हिरण, बकरी, गायों के पीछे लगा,
उनका शारीरिक और मानसिक दोहन कराता आ रहा है।
उसके ख़ूनी पंजों के निशान
हर अबोध पशु-पक्षी के शरीर पर दर्ज़ हैं।
वह गरजता है तब लगता है, मानो मक्कारी मे सने शब्द गूँज रहे हों।
उसने एक सिरे से दूसरे सिरे तक,
अपना मायाजाल फैला रखा है।
हर बकरी उसके इशारे पर मिमियाती आ रही है;
हर कुत्ता उसका संकेतदास बन, भौंकने का पूर्वाभास करने मे जुटा है;
किसे काटना और किसे छोड़ना है,
शेर की खाल मे छिपा भेंड़िया तय करता आ रहा है।
हर उल्लू और गीदड़ अपने अस्तित्व को गिरवी रखकर,
राजा की डुगडुग्गी पीटने मे लगा है।
कुछ बाघ और शेर उसके पक्ष मे समझौता कर चुके हैं;
अस्ली शेर-बाघ मौन दिख रहे हैं;
उन पर जंगली अदालत मे फ़र्ज़ी मुक़द्दमे चलाये जा रहे हैं,
‘जंगल का क़ानून’ तोड़ने का।
इसी की आड़ ले, अब–
जंगल का क़ानून बदला जा चुका है;
उस पर असभ्यता की सफ़ेद चादर यों बिछा दी गयी है,
मानो कोई लावारिस लाश अपने अर्थ का शिनाख़्त करते-करते चूक गयी हो।
सारी अनुच्छेद और धाराएँ,
निर्मम-नृशंस-निकृष्ट नक़्ली नृपति के पक्ष का अनुमोदन करती दिख रही हैं।
एक जंगल से दूसरा जंगल सहमा-सिमटा है;
वहाँ का हर जीवधारी जान चुका है,
शेर की खाल मे छिपे भेंड़िये की मंशा को।
उसने अपने ख़ूनी नाख़ूनो से चप्पे-चप्पे पर हस्ताक्षर कर दिये हैं,
ग़ुलामी जीवन जीने के नागरिकपत्र बनवा दिये गये हैं। साफ़-साफ़ है :–
दस्तख़त कर दो वा फिर अँगूठे के निशान से प्रमाणित कर दो–
हम अन्धेर नगरी-चौपट राजा के क्रीतदास बनकर जीना चाहते हैं।
दबाये-कुचले-नोचे-खसोटे निरीह जानवरों ने,
अब एकता का मन बना लिया है;
प्रभुत्वसम्पन्न नक़्ली शेर से डरने से बेहतर है,
अपना एक संघटन हो,
अत्याचारी जंगली राजा से दो-दो हाथ करने के लिए।
न्याय का राजा हारा हुआ जुआरी दिखता है,
उसे भय है, उसकी आवाज़ गुम होने का; उसका दम दफ़्न होने का।
जंगल मे चहुँ ओर जश्न है;
‘घोंघा बसन्त’ बने राजा की हर अँगुली शुद्ध घी मे नहा रही है;
वह ख़ुद बेलगाम होकर,
असत्य, अन्याय तथा कदाचार की गंगा बहाने मे मश्गूल है।
जंगल की फूल-पत्तियाँ, डाली-डाली,
भयाक्रान्त हैं, यह सोचकर–
तुग़लकी राजा का अगला फ़र्मान क्या होगा?
(दो)
अब बहुत सो चुके....
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जीभर आँखें खोलो!
देखो!
इन नामर्द दरवाज़ों को;
इनके पल्ले,
सिटकिनियों के इशारे पर नाचते आ रहे हैं।
भीतर का माहौल
अघोषित आपातकालीन इन्तज़ामात१ के हवाले है।
हवा सामने से आँखें तरेरते ख़ौफ़ से बेचैन है;
वह दरवाज़ो को पैरों से खुरेदती है;
दिमाग़दार दोनो पल्लों के दरमियान२
सूराख़ आँखें मीचते दिखते हैं।
धूप अँगड़ाई लेते-लेते काहिल हो जाती है।
चहलक़दमी की आहट कानो को चिढ़ाती है;
सख़्त मिजाज़ी पहरा मौन है;
बेआवाज़ साज़३ नासाज़४ है।
मज़्बूत करो हथेलियों को;
सख़्त बना लो, एड़ियों को।
जब तुम दहलीज़५ के पास पहुँचोगे,
तुम्हारे क़दमो की बेख़ौफ़ आहट,
दरवाज़ों के सीने पर
हथौड़े की चोट-सी महसूस करायेंगी;
ख़ुद-ब-ख़ुद पल्ले ‘धक्-धक्’ धड़कते नज़र आयेंगे।
भीतर की चुगुलख़ोरी,
नाज़ाइज६ औलाद की तरह सन्न मार जायेगी।
तुम्हारे तमतमाते चेहरे से ताक़त पाते,
भींचते हाथ जब उसके गालों पर पड़ेंगे;
सारे राज़ प्याज के छिलके-मानिन्द,
पर्दाफ़ाश होते दिखेंगे।
उठो!
दिखाओ हथेलियों के ज़ोर को; एड़ियों की ताक़त को;
नेस्तोनाबूद७ करते हुए,
दस्तख़त कर दो, हर नापाक मंशा के सीने पर।
शब्दार्थ :–
१अरबी-भाषा के शब्द ‘इन्तिज़ाम’ का बहुवचन; व्यवस्था (हिन्दी मे ‘व्यवस्था’ स्वयं मे बहुवचन का शब्द है।) २फ़ारसी-भाषा; बीच ३आवाज़ ४प्रतिकूल ५फ़ारसी-भाषा का शब्द; डेहरी ६अरबी-भाषा का शब्द; अनुचित (जायज़-नाजायज़ शब्द अशुद्ध हैं।) ७फ़ारसी-भाषा का शब्द; विध्वस्त (‘नेस्तनाबूद’ अशुद्ध शब्द है।)
(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २३ दिसम्बर, २०२३ ईसवी।)