माँ! कुछ तो बोलो!

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
(प्रख्यात भाषाविद्-समीक्षक)

कौन-सा अपराध! कैसी गुस्ताख़ी!

मैं तो था, मात्र मांस का एक लोथड़ा।
शक़्ल अख़्तियार करने से पहले ही
मेरे वजूद को मिटा डाला?
तुम ममत्व और अपनत्व के
द्वन्द्व में उलझी रही,
और पिता
लोक-लज्जा का स्मरण कराते हुए,
तुम्हें बाध्यता और लाचारी के
गह्वर में पैठाकर,
‘कुन्ती’ और ‘गंगा’ का
आख्यान सुनाते रहे
और तुम किंकर्त्तव्यविमूढ़-सी बनी,
सम्मोहित होती रही।
माँ! तुम्हारी गोद इतनी अशक्त हो चुकी थी—
मैं आश्रय न पा सकूँ?
वात्सल्य और ममता की चादर
मैली क्यों होती रही माँ?
समझ नहीं पाता?
तुम्हें माता कहूँ;
विमाता कहूँ
या फिर कुमाता कहूँ ?
बोलो! चुप क्यों?

(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, इलाहाबाद; १४ मई, २०१८ ई०)