जगन्नाथ शुक्ल, इलाहाबादऋतु काव्य जहाँ रिसता रहता , यह वह पावन संगम घाटी माँ।
नमन तुम्हे हे! माँ गंगे, अविरल जिसकी परिपाटी माँ।।१।।
हम कैसी तेरी संतान हैं माँ,
कलुषित कर दी है छाती माँ।
कैसे कह दें हमने उत्सर्ग किया,
कोरी रह गई अंतस की पाटी माँ।।२।।
तूने है हमको पाला पोसा,
कहते तुमको अपनी थाती माँ।
हमने जो दूषित किया तुम्हें,
तुमने यह दुःख कैसे काटी माँ।।३।।
हमारी इस दुर्बुद्धि पे तुमने,
क्यों न हमको डाँटी माँ।
तुमने हम निर्बुद्धि के प्रति,
फैली विष खाईं कैसे पाटी माँ।।४।।