माँ की ममता

अमर आकाश, श्रीनगर, पूर्णिया बिहार

माँ की ममता की छाया,
जिसने सदा हमें दुलराया ।
माँ के आँचल का वह लालन,
जिसमें हुआ मेरा पालन ।
पाकर जिसकी उँगली का सहारा,
घूमा मैं और देखा है नज़ारा ।

माँ की ममता की छाया,
जिसने सदा हमें दुलराया ।

माँ याद हमें वह दिन है आता,
जब मेरे गृहकार्य न कर पाने का डर था तुम्हें सताता ।
देखती थी मेरी कॉपी तुम पन्ने गिन – गिन,
कार्य अधूरा देख कान्ति हो जाती थी मलिन ।
फिर शिक्षक की मार से बचाने को,
छोड़ चूल्हा-चौका बैठ जाती मेरा गृह कार्य करानेे को ।
मेरे चक्कर में तुमको हो जाता लेट,
जिस कारण घर में सबको करना पड़ता खाना बनने का वेट ।

माँ की ममता की छाया,
जिसने सदा हमें दुलराया ।

माँ को कभी-कभी मेरी गलती के कारण सुननी पङती थी लोगों की बात,
किंतु माँ तूने कभी ना छोडा मेरा साथ ।
होती मेरी जो भी इच्छा,
हो कोई भी मजबूरी,
करती थी तू पूरी ।
माँ तेरी यह करुणा,
मुझे हमेशा देती है प्रेरणा ।

माँ की ममता की छाया,
जिसने सदा हमें दुलराया ।