सखी, राह तुम अइसि बतायउ ।
चलतै गयेन, न मुड़ि कै देखेन,
सही बात तुम नाय बतायउ ।
आगे मिलो सून चउराहो,
कउनिउ राह न हमइ सुझायउ ।
सखी, राह तुम कइसि बतायउ ?
पुनि प्रति राह भई दुइ डगरी।
आठौ दिशा बिखरि गईं सगरी ।
अपनोई प्रश्न, आपनोई उत्तर;
‘अन्धरेक आन्धर बिबस खेदिया’
बिनु पतवारी नाव चलायउँ ।
मूरखमती थपेड़े खायउँ ।।
ताल-पहाड़ पार की घाटीम,
एक अनोखी गुफा मिलि गई।
द्वार पाल दुइ चुप-हुइ ठाढ़े,
हमका देखतै गुफा खुलि गई।
पूछेइ बिना प्रवेसु को धायउँ ।
दुनहू हमका रोकि न पायउँ ।।
कँकरीली गुफा के कंकड़,
चमकैं जइसे सोन चमकुआ।
सौधु-सदन सी सबै देवालै,
माया छाया जइस दमकुआ ।
सखी, रहसु कछु जानि न पायउँ ।
जानइ बदि कछु कदम बढ़ायउँ ।।
विविध रंग के फूल,फुलैय्या ।
कमल कमलिनी केरि तलैय्या ।
भ्रमर, भम्भीरी, तितलि, ततैय्याँ ।
सगरी नाचैं ता-ता थैय्या ।
अपने कइहाँ रोकि न पायउँ ।
नाचै बदि धकि कदम बढ़ायउँ ।।
आगे, गुफा के अजब उजेरेम,
देखेन बड़ि-बड़ि फटिक शिलायें ।
इक-इक पइहाँ मननन मनई,
पीतवासनी, मौन सभायें ।
‘मूर्तिमान सब, कुछ पूछा चाहेउँ ।
अमित-प्रतीक्षा, कुछ ना पायउँ।।
याक शिला पर चारिउ- वरिया,
भेंड़-भेड़िया, शेर बकरियाँ;
साँप-छछूँदरि, बाज गिल्हरियाँ,
साथै बइठे, जानैं कबतें ??
कौनु बतावै कब- लौं कबते??
अकथ अचम्भा समुझि न आयउ।।
राति दिना सब याकै तन के ।
हुआँ न कोई सोवै जागै ।
हुआँ न कोई बूढ़-बयरुआ;
भूख पियास न उनके लागै ।
सर्दिउ गर्मी नाय जनायउँ ।।
सखी! अइस हम कहूँ न पायउँ ।।
बड़ी दूरि तब एक शिला पर,
लिखा जो पाएन, मनु हर्षाओ ।
“आप्तकामियों का यहु धाम ।
अमित काल करू हियँ विश्राम ।।”
सोचेन सबै कामना बाकी,
मूरख! हियाँ कहाँ तुम आयउ ।।
अब का हुइहै, चुको न सोचे,
कउनौ राह न हमइ सुझायउ ।
आँखी मूँदि लेइ कै झटका,
किटकिटाइ बाहेर उड़िधायउँ ।
खुली आँखि, शैय्या पर पायउँ ।
सूखो मुँहु, लुटाइ सब आयउँ ।।
‘बुद्ध के धाम’ गयेन रहै घूमै,
बुद्धू बनि कै वापस आयउँ ।
सखी! राह तुम जइसि बतायेउ;
हमरे हित तुम नीकि बतायउ ।।
अवधेश कुमार शुक्ला
मूरख ह्रदय
सिद्धार्थ जयन्ती
बुद्धत्व की पूर्णिमा
महापरिनिर्वाण दिवस
सुपर मून, वैशाख
26/05/2021