स्वजन बनते दुर्जन

● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

आस्था
विश्वास
आश्वासन
श्रद्धा
भक्ति
समर्पण
साहित्य के विषय हैं
और सिद्धान्त के भी।
व्यवहार के जगत् मे
इनका प्रयोजन
छल-प्रपंच से है।
स्वजन
दुर्जन बन जाते हैं।
एक निर्वात् दृष्टिबोध
प्रकट होता है,
और चरित्र पर
दृष्टि-अनुलेपन कराकर
अन्तर्हित हो जाता है।
अकस्मात् चिर-संचित
क्षणिक विश्वास भी
कापुरुष बन जाता है।
विश्वास की रेखा
लक्ष्मण-रेखा सिद्ध होती है।
अदृश्य रावण अपहृत विश्वास को
मृग-मरीचिका की प्रतीति लिये
मन-मस्तिष्क के सघन वन-प्रान्तरों मे
अलक्षित हो जाता है।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १९ नवम्बर, २०२२ ईसवी।)