कविता : पिता


पिता का आशीर्वाद
हरे दुर्वादल के जैसा ;
जिंदगी में कभी अपने को कमजोर न समझना ,
थोड़े से में भी खुश रहना।

पिता का दुलार
शहद के जैसा ;
मातृभूमि रक्षा हेतु, धूलि तिलक कर ,
वीरपुत्र को रणक्षेत्र में भेजते।

पिता की डांट
नीम के जैसा;
हमारे अंतर्निहित दुर्गुणों को दूर कर देते।

पिता की फटकार
नारियल के जैसा ;
हमें हर मुश्किलों से लड़ना सिखाते।

पिता का हृदय
सागर के जैसा ;
हमारी बड़ी गलतियों को भी क्षमा कर,
नेक राह पर चलने को कहते।

पिता की सीख
चेतना प्रकाश जैसा ;
जीवन के हर मोड़ पर
अर्थ से भी मूल्यवान।

चेतना चितेरी
प्रयागराज, उत्तर प्रदेश।