उस क़ुद्रत को सलाम, जो जिलाती है ज़िन्दगी

● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

बेजान सड़क पे गुमनाम, दिखती है ज़िन्दगी,
अनजान-सी हक़ीक़त, दिखती है ज़िन्दगी।
उस हवा को दुलार, जो मन को सुकून दे,
उस धूप को सलाम, जो खिलाती है ज़िन्दगी।
सूखे हैं आँसू, तकिये का मिज़ाज बोलता,
उस नदी को सलाम, जो सरसाती है ज़िन्दगी।
मन खिन्न औ’ उदास, उसकी आवारगी देख,
उस वादी को सलाम, जो हरषाती है ज़िन्दगी।
सियासत का वश चले, तो दे इंसानियत को रौंद,
उस क़ुद्रत को सलाम, जो जिलाती है ज़िन्दगी।
दीवानगी का आलम, कुछ मत पूछिए हुजूर!
उस महब्बत को सलाम, जो मिलाती है ज़िन्दगी।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १७ जून, २०२२ ईसवी।)