मौक़ा मिलते ही, बेलगाम हो लिये

अर्ज़ किया है

★ आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

आँखों-आँखों में, वे सलाम ले लिये,
बन्द होठों से मेरे, वे पयाम ले लिये।
लब थरथरा गये, मंज़र को देखकर,
झुकीं ज्यों नज़रें, वे सलाम ले लिये।
होठ खुले, अधखुले, बन्द होते रहे,
जाने कब चुपके से, कलाम ले लिये।
सलीक़ा सीख कर भी, ‘सीख’ न सके,
मौक़ा मिलते ही, बेलगाम हो लिये।
उनकी खुसूसियत हर ज़बाँ पे ठहरी,
रफ़्ता-रफ़्ता, फिर वे आम हो लिये।
हुनर कभी उनका बलन्दियों पे था,
जाने कैसे-क्यों, वे अनाम हो लिये।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १७ जनवरी, २०२२ ईसवी।)