प्रयाग तो देश-देशान्तर में परिव्याप्त है, फिर इलाहाबाद तक ही क्यों?

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय


‘प्रयाग’ अथवा ‘तीर्थराज प्रयाग‘ के सम्बन्ध में पुराणों का मत है कि प्रयाग उसे इसलिए कहा गया है कि वह समस्त तीर्थों में सर्वोत्तम और उत्कृष्ट तीर्थ है। देवताओं की यज्ञभूमि होने के कारण उसे प्रयाग कहा गया है। यज्ञादिक और दान-पुण्य के के सर्वथा उपयुक्त समझकर स्वयं विष्णु भगवान् और त्रिलोकपति शंकर ने उसको प्रयाग नाम दिया है। महाभारत के ‘अनुशासनपर्व’ में कहा गया है कि माघ-मास में तीन करोड़ दस हज़ार तीर्थ प्रयाग में एकत्र होते हैं।
प्रयाग शब्द की उत्पत्ति ‘यज्’ धातु से है, जिसमें ‘प्र’ उपसर्ग प्रकृष्ट, श्रेष्ठ तथा याग शब्दवाची है। इस संज्ञा के निर्वचन के विषय में महाभारत के पूर्वोक्त विचार का समर्थन अन्य ग्रन्थों से भी होता है। ‘ब्रह्मपुराण’, ‘मत्स्यपुराण’ में प्रयाग का बृहद् वर्णन है।
उत्तरप्रदेश के मुख्यमन्त्री इलाहाबाद का नाम-परिवर्तन कर ‘प्रयाग’ करने का मात्र एक राजनीतिक उपक्रम करना चाहते हैं। ‘प्रयाग’ तो देश-देशान्तर में परिव्याप्त है। यदि वे परिवर्तन करना ही चाहते हों तो अपने आचरण की सम्यता परिवर्तित करें और समदर्शी-निस्पृह बनकर अपने योगी होने का प्रमाण दें। इससे पूर्व कल्याण सिंह ने इलाहाबाद का नाम ‘प्रयागराज’ किया था; परन्तु प्रयागराज ने उसी स्वीकार नहीं किया। आश्चर्य है, जिस प्रयागराज की महिमा युगों से ‘प्रयागराज’ के रूप में वेद-वेदान्तों में वर्णित है, उसके विस्तार को मात्र कुछ ही क्षेत्रफल और जनसंख्या में सिमटाया जा रहा है। यह तो एक प्रकार का पापकर्म है। जिस प्रयागराज के वैशिष्ट्य और विस्तार का गुणगान हमारे पुराण-ग्रन्थों के प्रणेता और तुलसी दास ने किया है, उसे मात्र ‘इलाहाबाद’ तक संकुचित किया जा रहा है, इस बिन्दु पर हमारे तथाकथित धार्मिक कर्मकाण्डी पण्डित गम्भीरतापूर्वक विचार करें।
(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, इलाहाबाद; १५ अक्तूबर, २०१८ ईसवी)