‘सर्जनपीठ’, प्रयागराज की ओर से भारतेन्दु हरिश्चन्द की पुण्यतिथि (६ जनवरी) के अवसर पर राष्ट्रीय आन्तर्जालिक बौद्धिक परिसंवाद का आयोजन

प्रयागराज। ‘सर्जनपीठ’, प्रयागराज के तत्त्वावधान मे आधुनिक हिन्दी-साहित्य के पितामह भारतेन्दु हरिश्चन्द की पुण्यतिथि की पूर्व-संध्या मे ‘भारतेन्दु हरिश्चन्द के साहित्य मे सामाजिक व्यवस्था के अत्याचार की प्रासंगिकता कितनी’ विषय पर एक राष्ट्रीय आन्तर्जालिक बौद्धिक परिसंवाद का आयोजन किया गया, जिसमे देश के अनेक भागोँ से प्रबुद्धजन की सहभागिता रही।

आशुतोष सुन्दरम् (पूर्व-कार्यक्रम-प्रमुख आकाशवाणी, प्रयागराज) ने कहा– भारतेन्दु हरिश्चन्द को युगधर्मी साहित्यसर्जक माना जाता है। तत्कालीन परिस्थितियोँ मे भारतेन्दु जी ने जिन सामाजिक विद्रूपता का चित्रण किया, वह आज भी हमारे समाज मे परिलक्षित हैँ। उनके नाटक अंधेर नगरी और भारत दुर्दशा मे व्यक्त टिप्पणी आजके समाज पर करारा तमाचा जड़ती हुई दिख रही है। उन्होँने अपनी काव्यकृतियोँ स्त्रीशिक्षा और सतीप्रथा मे नारी-अधिकारोँ के लिए जो आवाज़ उठायी है, उससे तथाकथित आज के विकसित समाज को सीख लेनी चाहिए।

ममता जैन (लेखिका एवं साहित्यकार, महामन्त्री :– राष्ट्रीय युवा प्रकोष्ठ, श्री दिगम्बर जैन महिला-महासमिति, पुणे) ने बताया– भारतेन्दु जी का साहित्य केवल आलोचना नहीँ करता, बल्कि समाज-सुधार के लिए चेतना भी जाग्रत् करता है। आज भी, जब सामाजिक असमानता, भ्रष्टाचार और नैतिक पतन जैसे प्रश्न मुखर दिख रहे हैँ तब उनका साहित्य उतना ही प्रासंगिक और प्रेरणादायी प्रतीत होता है।

आयोजक, व्याकरणवेत्ता एवं भाषाविज्ञानी आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ने कहा– भारतेन्दु जी ने जिस स्वाभाविक शैली मे प्रखरता और मुखरता के साथ सार्वकालिक सामाजिक व्यवस्था के अत्याचार की कमज़ोर नसोँ पर चोट की है, उससे संवेदनशील सामाजिक घटक कराह तो उठता है; परन्तु गैंडे की खोल ओढ़े पाखण्डी, पापी, लोभी, कुपात्र एवं जीवनमूल्य-शून्य सामाजिक वर्ग की चेतना शून्य पड़ी रहती है। यदि संवेदना का स्पन्दन रहता तो भारतेन्दु की अभिधा, लक्षणा और व्यंजना का सार्वत्रिक प्रभाव दिखता तथा तज्जनित परिणाम भी। खेद है, ऐसे कुत्सित चरित्रवाले चेहरे आत्मकेन्द्रित रहकर आत्ममुग्ध बने हुए हैँ।

पी० वेंकटेश्वरन् (शोध-निदेशक :– अन्नादुमराई इन्स्टिट्यूट ऑव़ इण्डिया, हैदराबाद, तेलंगाना ने कहा– भारतेन्दु जी का साहित्य एक युगीन साहित्य है। उन्होँने एक त्रिकालदर्शी के रूप मे समासीन होकर जिस-जिस प्रकार की कृतियोँ का प्रणयन किया, उसमे उनके साथ युगबोध संवाद करता हुआ दिखता है। भारत दुर्दशा हो वा अन्धेर नगरी वा अन्य कोई रचना, सबमे उनका समयसत्य चिन्तन मुखरित होता है।