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प्रतिष्ठित साहित्यकार कृष्णेश्वर डींगर जी का शरीरान्त!

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय


● ‘परिधि से केन्द्र तक’ की मनोरम यात्रा करानेवाले ‘श्रद्धेय कृष्णेश्वर डींगर जी’ हमें यात्रा कराते-कराते, स्वयं चिरनिद्रा में लीन हो गये!

प्रयागराज के विश्रुत सारस्वत हस्ताक्षर और हमारे श्रद्धास्पद सर्जनधर्मी कृष्णेश्वर डींगर जी दशकों तक साहित्यिक यात्रा पर सह-अनुभूति के साथ चलते रहे और तब तक सहयात्री बने रहे जब तक उनका तन-मन साथ देता रहा। अन्तत:, शताधिक शब्दयात्रा करते-करते, उनकी कायिक अवस्था विचलित हो चुकी थी; अन्तत:, कल (१८ जून) सान्ध्य वेला में हम सभी को बिना सूचित किये महाप्रयाण कर गये थे। मितभाषी, निश्छल तथा सात्त्विक विचारधारा का निर्वहण करनेवाले हमारे नितान्त अपने डींगर जी ८८ वर्ष पौने ४ माह की आयु में अपने उस चालीस वर्षीय सर्जनशील मंच ‘वैचारिकी’ परिवार को शोकमग्न करते हुए, सदा के लिए ‘ब्रह्म और जीव’ के लोक में जा चुके हैं, जहाँ एक कृतिकार अपनी रचना का पाठ करता था और हम कुछ वैचारिक मित्र निर्द्वन्द्व रहकर उसकी समीक्षा करते थे।

‘परिधि से केन्द्र तक’ ‘गाँधारी’, ‘अपने-अपने इरादे’, ‘एक बूढ़ा’ पेड़’, ‘गीता-काव्य-कौमुदी’, ‘समय-संकेत’, ‘सत्यबोध’, ‘सिमटती झील’ आदिक विविध विषयक कृतियों का प्रणयन कर लब्ध-प्रतिष्ठ डींगर जी अमरत्व के उत्तुंग शिखर पर समासीन हो चुके हैं। अनेक संस्थाओं ने उनकी शब्दधर्मिता के प्रति कृतज्ञता-ज्ञापन करने के उद्देश्य से उन्हें प्रतिष्ठित सम्मानों से समलंकृत भी किया था।

वाह! क्या संयोग है, प्रयागराज-स्थित किदवई नगर, अल्लापुर में उन्होंने अपने भवन का नाम ‘विश्रान्ति’ (तीर्थ, विश्राम) रखा था; क्योंकि उन्हें पूर्वाभास हो चुका था कि उनके क्लान्त शरीर को विश्रान्ति ‘विश्रान्ति’ में ही मिलेगी।

मुझे इस विषय पर गर्व है कि समादरणीय कृष्णेश्वर डींगर ‘मेरे अपने’ थे :– पितृतुल्य और अग्रजसम भी। मैं अपने प्रत्येक आयोजन में उनका स्मरण करता था और वे उपस्थित रहकर हमारा मार्गदर्शन करते थे।

श्रद्धांजलि का अर्पण तो उनके लिए होता है, जो कभी दिखते ही नहीं। शताधिक सारस्वत आयोजनों में मेरे साथ, एक मंच पर आसीन रहकर उनका उद्बोधन, मेरा अपनी अनेक संस्थाओं की ओर से उनका समादर-सम्मान और ‘विश्रान्ति’ में पहुँचने पर आग्रहपूर्वक उनका ‘स्वल्पाहार’ (पेड़ा, बरफी, रसगुल्ला आदिक मिष्टान्न) कराना; उनकी वयोवृद्धा श्रीमती जी और मेरी श्रद्धेया भाभी जी के कृशकाय रहने के बाद भी उनके विनम्र हाथों से बनायी गयी चाय, नमकीन आदिक की आत्मीय अनुभूति जीवनपर्यन्त मेरे साथ रहेगी।

शरीरान्त तो सभी का होता है। आज (१९ जून) हम सारस्वत मित्रवृन्द दिन में उन्हें अपने साथ लेकर श्मशानघाट, रसूलाबाद जायेंगे और उनकी देह को अग्निदेव के संरक्षण में सौंपकर चले आयेंगे; जैसी कि परम्परा है; किन्तु वे हमारे अन्त:स्थल में विद्यमान रहकर हमारे साथ संवाद करते रहेंगे, यह सन्तुलित विश्वास भी है।

ऐसे मनस्वी का सदा की भाँति मैं अभिवादन करता हूँ :– श्रद्धेय! प्रणाम करता हूँ।

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