देश के प्रख्यात विषाणुविज्ञानी डॉ० शाहिद जमील के त्यागपत्र के कारण मोदी-सरकार कठघरे में!..?

‘मुक्त मीडिया’ का ‘आज’ का सम्पादकीय

★ आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

वैसे तो ‘न्यू इण्डिया की मोदी-सरकार’ का अड़ियलपना और ‘अपने ही जोते रहने का संस्कार’ के आरोप उसकी सरकार-गठन के बाद से ही लगाये जाते रहे हैं। अब कोरोना-काल में भी उस पर खुलकर आरोप मढ़े जा रहे हैं। मोदी-सरकार और उसके प्रशासनिक अधिकारियों पर जो आरोप लगाये गये हैं और जिसके चलते मोदी-सरकार को पारदर्शिता के साथ सीधे कठघरे में ला खड़ा किया गया है, वह देश के समस्त नागरिकों के जीवन-मरण के प्रश्न से जुड़ा हुआ है।

उल्लेखनीय है कि कोरोना पर नियन्त्रण पाने के लिए मोदी- सरकार के स्वास्थ्यमन्त्रालय की ओर से २५ दिसम्बर, २०२० ई० को ‘आइ० एन० एस० ए० सी० ओ० जी०’ समूह का गठन किया गया था, जिसका उद्देश्य कोरोना-विषाणु की ‘जीनोम- शृंखला’ तैयार करने तथा जीनोम-स्वरूपों और महामारी के बीच सम्बन्ध तलाश करना है। विश्व-प्रख्यात शीर्षस्थ भारतीय विषाणुविज्ञानी डॉ० शाहिद जमील को ‘भारतीय सार्स सी० ओ० ह्वी०-२ जीनोमिक्स कंसोर्टियम’ (आइ० एन० एस० ए० सी० ओ० जी०) के वैज्ञानिक सलाहकार-समूह का चेअरमैन नियुक्त किया गया था। वह समूह अपनी पारदर्शिता के साथ अपने कर्त्तव्य का पालन कर रहा है; परन्तु मोदी-सरकार सुबूतों की अनदेखी करने और वैज्ञानिक समूह के काम में अड़ंगा डालने का काम कर रही है और हतोत्साह भी। इतना ही नहीं, नीति बनाने के लिए वैज्ञानिक पहलुओं पर विचार नहीं किया जा रहा है। उससे समूह के सदस्य खिन्न रहे हैं। यही कारण है कि देश के समूह के विज्ञानियों- चिकित्सकों की सलाह न मानने और वैज्ञानिक साक्ष्यों पर आधारित नीतियाँ न बनाने की सरकार की अड़ियल रवैया से असंतुष्ट होकर, विश्व के शीर्षस्थ विषाणु-विज्ञानी, कोरोना- नियन्त्रण के लिए रणनीति बनानेवाले समूह के प्रमुख डॉ० शाहिद जमील ने १४ मई, २०२१ ई० को अपना त्यागपत्र दे दिया था।

डॉ० ज़मील ने संयुक्त राज्य आमेरिका के प्रमुख दैनिक समाचारपत्र ‘दी न्यू यॉर्क टाइम्स’ में अपने विचार व्यक्त करते हुए, मोदी-सरकार को आड़े हाथों लिया है।

देश इस सत्य से परिचित हो चुका है कि देश में प्रतिदिन लगभग पौने पाँच लाख लोग कोविड से संक्रमित हो रहे थे, वही अब एक दिन के ही भीतर ग़लत और भ्रामक सरकारी आँकड़ों के अनुसार, लगभग तीन लाख दिखाये जा रहे हैं। प्रश्न है, देशभर में स्वस्थ उपचारहेतु चिकित्सालय, समुचित औषध, औषधयुक्त सुई (वैक्सिन), वेण्टिलेटर, प्राणरक्षिका वायु, प्राणरक्षिका-वायुमापी उपकरण इत्यादिक का अभाव है और वास्तविकता में शासन-प्रशासन ने लगभग हाथ खड़े कर दिये हैं, ऐसे में, संक्रमितों की संख्या घटनी चाहिए अथवा बढ़नी चाहिए, इसे समझना बहुत आसान हो जाता है।

स्मरणीय है कि डॉ० जमील ने पिछले दिनों सरकार की शिथिल मनोवृत्ति पर अपनी नाराज़गी जतायी थी। उन्होंने मार्च, २०२१ ई० में ही सरकार को ‘कोरोना के एक नये रूप (बी- १.६१७) के देश में आ जाने और फैलने के प्रति चेताया था; परन्तु मोदी-सरकार बेअसर रही; वह तो ‘राजनीतिक खेल’ खेलती रही; उसे तो ‘देश की जनता के जीवन’ से बढ़कर ‘सत्ता की राजनीति’ प्यारी रही है। इतना ही नहीं, उस समूह के चेअरमैन शाहिद जमील की चेतावनी के प्रति सरकारी अभिकरणों (एजेंसियों) के कर्मियों ने कोई सजगता नहीं दिखायी थी। यही नहीं, ३० अप्रैल, २०२१ ई० को देश के ८०० से अधिक भारतीय विज्ञानियों ने नरेन्द्र मोदी से अनुरोध किया था कि उन्हें विश्वस्त आँकड़े उपलब्ध करायें, ताकि वे आगे के अध्ययन को बढ़ा सकें; अनुमान लगा सकें तथा विषाणु के प्रकोप को रोकने के लिए प्रयास कर सकें। अफ़्सोस है, नरेन्द्र मोदी ने हमारे विज्ञानियों के अनुरोध को ठुकुराकर देशवासियों को कोरोना की आग में झोंक दिया है। यही कारण है कि प्रमुख विषाणुविज्ञानी शाहिद जमील को कहना पड़ा है– भारत में वैश्विक महामारी नियन्त्रण से बाहर निकल चुकी है। ऐसे में, आँकड़ों पर आधारित नीति-निर्णय भी समाप्त होना-जैसा है। इसकी मानवों से सम्बन्धित जो क़ीमत चुकानी पड़ रही है, उससे लगनेवाली चोट ‘स्थायी निशान’ छोड़ जायेगी।

डॉ० जमील ने बताया है कि सरकार ने कोरोना-टेस्टिंग में कमी करायी है; सम्बन्धित संसाधनों-सुविधाओं को उपलब्ध कराने के प्रति जिस स्तर पर सरकार की जागरूकता दिखनी चाहिए, वह नहीं दिख रही है; समूह पर सरकारी डाटा थोपा जा रहा है और सरकार वास्तविकता से आँखें चुरा रही है। इनके अतिरिक्त डॉ० जमील ने मोदी-सरकार की जनघातक नीतियों को लेकर उस पर कई गम्भीर आरोप मढ़े हैं, जो ‘जाँच’ के विषय हैं; परन्तु ‘कौन’ जाँच करेगा और करायेगा ‘कौन’। ये दो ‘कौन’ मानो कह रहे हों– पर्दा जो उठ गया तो ‘भेद’ खुल जायेगा।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १९ मई, २०२१ ईसवी।)