इलाहाबाद की सड़कों पर मौत का बसेरा!

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय


मानसून अपने उड़न-पथ पर आनेवाला है। इस दृष्टि से उत्तरप्रदेश का मुख्य जनपद ‘इलाहाबाद’ में ‘ख़तरे की घण्टी’ बज चुकी है; परन्तु यहाँ का प्रशासन ‘चैन की बंशी’ बजा रहा है।

लगभग एक वर्ष से इलाहाबाद नगर की प्रत्येक सड़क खोद दी गयी है और वहाँ मौत नाच रही है; अनेक फ्लाई ओवर निर्माणाधीन हैं; वे अपने सम्मोहन-आगोश में कब-किसको भर लें, अज्ञात है। वाराणसी-जैसी दुर्घटना की यहाँ भी पुनरावृत्ति हो सकती है, इससे इंकार नहीं किया जा सकता। इसकी चेतना, राज्य सेतु निगम, लोकनिर्माण विभाग, नगर निगम को नहीं है। यहाँ तक कि सम्बन्धित मन्त्रालय के मन्त्री और मुख्य मन्त्री भी बेख़बर हैं। इन तथ्यों को अस्वीकार नहीं किया जा सकता। ऐसा इसलिए कि उत्तरप्रदेश को गड्ढामुक्त करने की घोषणा करनेवाले उत्तरप्रदेश-शासन में मुख्यमन्त्री अब तक गड्ढामुक्त करने की अनेक अन्तिम तिथियाँ सार्वजनिक कर चुके हैं और वे अपने ही कहे हुए वचन का पालन न करवा पा रहे हैं और न कर पा रहे हैं, जो अब एक चरित्रवान, ईमानदार, कर्मठ, संघर्षवान्, सर्वशक्तिमान तथा लोकप्रियता के उत्तुंग शिखर पर समासीन एक निरंकुश शासक की प्रथम योग्यता सिद्ध हो चुकी है।

इलाहाबाद के पदातिक मार्ग (फुटपाथ) को खोद दिया गया है। पैदल चलनेवाले लोग किस मार्ग पर चलें? मानसून दस्तक देने ही वाला है; खोदे गये गड्ढों में पानी भर जाने पर सुरक्षित मार्ग कैसे मिलेंगे? सड़कों पर भयंकर गड्ढे पलक-पाँवड़े बिछाये हुए, शिकार की प्रतीक्षा में हैं; महाकीचड़ के मारक और दुर्गमनीय साम्राज्य की स्थापना अलग से हो जायेगी; अर्थात् आनेवाले मानसून में इलाहाबाद-नगरवासियों और आगन्तुक प्रवासियों के लिए इलाहाबाद-नगर किसी ‘नरक’ से कम सिद्ध नहीं होनेवाला है। कहीं ऐसा न हो कि हस्तिनापुर के राजसूय यज्ञ का परिदृश्य-सा सिद्ध हो—- जिन सड़कों के गड्ढों में पानी हो, उसे मात्र समतल सड़क-मार्ग के धोखे में राहगीर और वाहनचालक अपने जीवन से हाथ धो बैठें अथवा अंगभंग की गति को प्राप्त कर ले। फ़िलहाल, इलाहाबाद का प्रशासन ‘मौनी बाबा’ बना हुआ है। उत्तरप्रदेश का मुखिया वर्ष २०१९ के राजनीतिक समीकरण अपने पक्ष में बनाने के लिए ‘अंकगणित’ का अध्ययन कर रहा है तथा मात्र अधिकार की माँग करनेवाले इलाहाबाद के महापौर, पार्षद तथा नागरिक अपने कर्त्तव्य से ‘च्युत’ दिख रहे हैं। इलाहाबाद का मीडिया-तन्त्र भी अपंग दिख रहा है।
जय बोलो बेईमान की जय बोलो!

(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, इलाहाबाद; ९ जून, २०१८ ई०)