लघु कहानी- गोल्डन फ्रेम (यादें)

नीना अन्दोत्रा पठानिया-


क्या हुआ बीबी जी, हर शनिवार को आप कुछ ढूंढने के लिए बाहर चली जाती है। कोई जान-पहचान का है। जिसका पता आप ढूढती हो ? नंदा की काम वाली ने नंदा को आते देख पूछा ।
हाँ सविता है कोई । अगर वो न होती तो आज मैं यहाँ न होती,थके हुए स्वर में नंदा बोली ।
कौन बीबी जी आप मुझे तो बताओ, किसकी यादों को आपने इतने प्यार से सहेज कर रखा है । शायद मैं आपकी कुछ मदद कर सकूं।  सुनते ही नंदा खुश हो गई और सोचने लगी शायद सच में सविता मेरी मदद कर सके  । क्योंकि वो भी तो यहीं की थी, धीरे-धीरे नंदा उन धुंधली यादों को साफ करने लगी जो कभी उसने सुनहरे फ्रेम में सम्भाल कर रखी थीं ।
मैं पांच वर्ष की एक अनाथ ब्राह्मण बच्ची अपने चाचा-चाची के साथ रहती थी ।  मुझे पढ़ने-लिखने का कुछ पता नहीं । बस सारा दिन प्यार की तलाश में इधर-उधर भटकती ।एक दिन अचानक मैं एक औरत की साइकिल के नीचे आ गई। उसने मुझे झट से उठा लिया, दवाई करवाई और बहुत प्यार से मेरे घर छोड़ आई । मैं हर रोज़ उसके रास्ते में खड़ी रहती, कुछ दिन बाद पता चला वो पास के स्कूल में अध्यापिका है । मुझे रोज़ रास्ते में खड़ी देख , उन्होंने मेरा स्कूल में एडमिशन करवा दिया और हमेशा पढने के लिए प्रेरित करती । लेकिन मुझे पढना अच्छा नहीं लगता था । पर उसके साथ रहना कुछ सकुन देता था । हर शनिवार को उसके घर चली जाती और सोमवार को उसके साथ आती । उन दिनों जात-बिरादरी बहुत देखी जाती थी तो सभी बातें करने लगे कि ब्राह्मण बच्चा एक निम्न जाती के घर में रहता है । खाना तक खाता है । ये सब ठीक नहीं । यह सब कानाफूसी सुनकर दीदी ने अपना तबादला करवा लिया और जाते हुए समझा गई कि तुझे बहुत पढ़ना है और खुद के लिए इज्ज़त कमानी है ।
मैंने बहुत मासूमियत से पूछा । ये इज्ज़त क्या होती है ? सुनकर दीदी जोर-जोर से हँसी और मुझे प्यार करते हुए बोली, जब मेरी राजकुमारी पढ़-लिख कर ऑफिसर बन जायगी तब अपने आप समझ आ जायगा कि ये इज्ज़त क्या होती है ।
दीदी तो चली गई पर उनकी यादों का खजाना हमेशा मुझे उनसे मिलने को प्रेरित करता है । मैं चाहती हूँ, मैं उनसे मिलूं और उनको बताऊँ कि देखो अपनी राजकुमारी को जिसने आपको इतने सालों से यादों के सुनहरी फ्रेम में सम्भाल कर रखा है ।बोलते-बोलते नंदा की आँखे भर आई ।