सामाजिक परिवर्तन के संदर्भ में आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत जी द्वारा 2019 विजयादशमी को दिया एक भाषण मुझे याद है, उन्होंने कहा था कि – सामाजिक परिवर्तन के लिए ‘स्व’ केंद्रित सामूहिक दृष्टि विकसित होने या किए जाने की आवश्यकता है।
उन्होंने हिंदुत्व को भी राष्ट्र के ‘स्व’ की आत्मा रूप में परिभाषित किया था।
आगे उन्होंने ‘स्व’ की संकल्पना को बहुत ही स्पष्ट करते हुए कहा कि स्व का सार ही आरएसएस का वैचारिक चिंतन व कार्ययोजना का दिशा बोधक होना चाहिए।
स्व का सार ही आरएसएस का दीप स्तम्भ व आरएसएस के स्व निर्मित देश की सामूहिक संचेतना की दिशाओं, उनकी महत्वाकांक्षाओं एवं अपेक्षाओं को आलोकित करे।
इस स्व निर्मित राष्ट्र में आरएसएस द्वारा किये जाने वाले सभी प्रयास और परिणाम भी इसी स्व के सिद्धांत पर आधारित होने चाहिए।
तभी और केवल तभी भारत को स्व-निर्भर कहा जा सकता है।
समीक्षा;
स्व मतलब (निजी) अपना, अपने लिए, स्वयं हेतु।
सर्व मतलब (सामाजिक) सबका, सबके लिए, सभी हेतु।
उपरोक्त भाषण के अंश में आरएसएस व भाजपा की मंशा एवं उनकी कार्ययोजना के विस्तारीकरण का रहस्य छिपा हुआ है।
जब यह भाषण दिया जा रहा था इसके तुरंत बाद मेरी ओर से उन्हें एक पत्र द्वारा उनके “स्व” केंद्रित सोंच पर आधारित अनगिनत शंकाओं व भारतीय मूल आत्मा “सर्व” की हत्या का सार्वजनिक ऐलान किए जाने के विचार पर कड़ी आपत्ति व सुझाव भेजे थे।
पता नही उन्होंने यह पत्र पढ़ा होगा या नही लेकिन आज आधा 2022 बीत जाने के बाद मुझे स्पष्ट हो चुका है कि आरएसएस की राजनैतिक सत्ताधारी शाखा मौजूदा भारतीय जनता पार्टी अपनी मातृसंस्था आरएसएस के उसी “स्व” केंद्रित विचारधारा पर कार्यरत है।
तभी तो भारतीय मूल आत्मा “सर्व” पर आधारित संसाधनों, संस्कृति, सभ्यता व सिद्धांतों को “स्व” केंद्रित करने की ओर बड़ी तीव्रगति से भाजपा प्रमुख मोदी जी अग्रसर हैं।
सदियों से जिस भारत की मूल आत्मा की पहचान उसकी सर्व-संसाधन, सर्व-संस्कृति, सर्व-सभ्यता व सर्व-सिद्धांतों के रूप में होती आ रही थी आज आरएसएस/भाजपा की “स्व” पर आधारित कुराजनैतिक महत्वाकांक्षाओं ने उसी भारतीय मूल आत्मा “सर्व” को हटाकर स्व-संसाधन, स्व-संस्कृति, स्व-सभ्यता व स्व-सिद्धांतों तक सीमित करने का भरकस प्रयास करे जा रही है।
आज जो कुछ भी हिंदुत्व के नाम पर राजकीय कार्य मौजूदा शासनसत्ता द्वारा व उन्ही के द्वारा आदेशित राजकीय कर्मचारियों द्वारा किये जा रहे हैं वो सभी कृत्य सनातनी मूल आत्मा “सर्व” केंद्रित विचारधारा को नष्ट कर आरएसएस की मूल आत्मा “स्व” केंद्रित विचारधारा को बढ़ाया जा रहा है।
विचारणीय प्रश्न;
1● क्या सदियों से भारतीय हिन्दू अपनी मूल पहचान “सर्व” जैसी विस्तारवादी विचारधारा को छोड़कर “स्व” जैसी संकीर्ण व विध्वंसकारी विचारधारा को स्वीकार कर लेंगे?
जबकि हम सबके पास हमारी अमूल्य धरोहर रूपी सीख (इतिहास) को जिसे हम रामायण, महाभारत व अनगिनत ग्रंथों के माध्यम से पढ़ते व सुनते आ रहे हैं अपने पूर्वजों द्वारा।
इसी “स्व” केंद्रित विचारधारा के कारण ही तो प्रभु श्री राम को रावण का वध व वंशनाश करना पड़ा एवं इसी “स्व” केंद्रित विचारधारा के कारण ही तो पांडवों को अपने ही भाई दुर्योधन सहित असंख्य स्वजनों का वध करना पड़ा था।
ज्यादा दूर जाने की जरूरत नही आज़ादी के बाद पिछले 75 वर्षों का राजनैतिक इतिहास इसी स्व केंद्रित विचारधारा के दूषित घटनाक्रमों से भरा पड़ा है।
चाहे वो इंदिरागाँधी का “Indira is India, India is Indira” का स्व केंद्रित विचारवादी नारा ही हो, आज उसी इंदिरागांधी की काँग्रेस पार्टी का हाल किसी से छुपा नही रह गया।
मौजूदा श्रीलंकाई घटनाक्रम इस “स्व” केंद्रित विनाशकारी विचारधारा का जीता जागता उदाहरण है।
ऐसे अनगिनत उदाहरण हैं इस विघटनकारी व विध्वंसक “स्व” केंद्रित विचारधारा के जिसे आरएसएस व भाजपा अपनी मूल आत्मा के रूप में स्वीकारकर सनातनी “सर्व” की भारतीय मूल आत्मा को कुचलकर आत्ममुग्धता के रथ पर सवार है।
हे! आरएसएस/भाजपा। दूसरों से दूर होकर नहीं बल्कि दूसरों के साथ सामंजस्य बनाकर ही सुन्दर और सभ्य जीवन जिया जा सकता है।
स्वमुग्धता सदैव विनाशकारी सिद्ध होती है। “स्व का सर्व में समन्वय” ही सत्मार्ग है। इस संसार में सब कुछ अंतर्सम्बद्ध है। एक वस्तु दूसरी वस्तु से भिन्न नहीं है। एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति से भिन्न नहीं है।
सब कुछ परस्पर सूत्रबद्ध है। यही भौतिक विज्ञान का भी प्रतिपादन है। जिसे “थ्योरी ऑफ़ रिलेटिविटी” कहते है। यह पारस्परिक अंतर्सम्बद्धता का सिद्धांत ही सभ्यता को जन्म देता है। स्वाभिमान को सर्वाभिमान में परिवर्तित करो। इसी में मानव जीवन की धन्यता है। जो एक है वही दूसरा भी है। अतः जो एक का अधिकार है वही दूसरे का भी अधिकार है। यही न्याय की आधारशिला भी है। यह ‘न्याय’ ही समाज व राष्ट्र का वास्तविक धर्म है।
वर्तमान भारत में वास्तविक धार्मिक व न्यायशील राजनैतिक पार्टी यदि कोई है तो वो है आमआदमीपार्टी जिसके मुखिया श्री अरविंद केजरीवाल जी हैं जिनकी सार्वजनिक कार्य योजना “स्व केंद्रित” नही बल्कि सनातनी भारत की मूल आत्मा “सर्व केंद्रित” है। इसलिए आमआदमीपार्टी के साथ जुड़कर इस सर्वहितकारी, सर्वउत्थानकारी, सर्व केंद्रित विचारधारा को जन-जन तक पुनः पहुंचाने हेतु खुद को रामायण वाली गिलहरी की भूमिका में आने के लिए प्रेरित करें।
|शुभकामना|
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राम गुप्ता (स्वतंत्र पत्रकार)
अति साधारण कार्यकर्ता/प्रचारक
आमआदमीपार्टी, उत्तरप्रदेश