बृजेश पाण्डेय ‘बृजकिशोर’
बेनीगंज गाँव में रामदयाल नाम का एक युवक रहता था। उसके परिवार (फैमिली) में माता-पिता और दो छोटी बहनें थीं। पाँच बीघे खेती योग्य जमीन है। समीप के पाठशाला में आठवीं तक पढ़ने के बाद नवीं कक्षा में हायर सेकेण्डरी स्कूल में प्रवेश लेता है। पढ़ने में ब्रिलियंट है। स्कूल में हमेशा प्रथम स्थान लाता है। यहीं से इण्टरमीडिएट की परीक्षा उत्तीर्ण करता है।
छोटी बहनें भी पढ़ने जाती हैं। बड़ी छठवीं में और छोटी चौथी कक्षा में पढ़ती है। पिता खेती करके तीनों बच्चों को पढ़ा-लिखा रहे हैं; पालन-पोषण कर रहे हैं। घर का खर्च भी इसी पाँच बीघे की खेती से चल रहा है।
ग्रेजुएशन के लिए वह शहर आता है। जहाँ उसकी मुलाकात एक सम्पन्न घराने के युवक महेन्द्र से होती है। महेन्द्र के पिता डिप्टी कमिश्नर हैं। महेन्द्र कॉलेज में दाखिला न होने पर पौवा (सिफारिश) लगाता है। वह कॉलेज के बाबू को चार हजार रुपए देकर प्रवेश पा जाता है। दोनों में गहरी दोस्ती हो जाती है। साथ-साथ रहते हैं, खाते हैं, पीते हैं। कोई भी काम बिना एक-दूसरे के मशविरा के नहीं करते हैं।
एक दिन महेन्द्र कहता है कि मित्र चलो कहीं घूमने चलें। रामदयाल उसकी बात मान जाता है और दोनों टहलते-टहलते सिविल लाइंस के एक रेस्तरां के सामने जाकर रुकते हैं। क्या खूब दिखता था! आलीशान बनावट, रंगीन काँच से सजी दीवारें, ऐसा लगता था कि प्रधानमंत्री (प्राइम मिनिस्टर) का बंगला हो। गेट पर गेटकीपर टहलता हुआ। महेन्द्र रामदयाल से रेस्तरां में चलने को कहता है। दोनों जाते हैं। एक कप चाय की कीमत चालीस रुपए है। रामदयाल वापस लौटना चाहता है, लेकिन महेन्द्र कहता है कि एक-एक कप चाय पीकर चलते हैं। दोनों चाय पीते हैं। बिल महेन्द्र चुकाता है। दोनों रूम पर वापस आये। रूम में दो बिस्तर हैं एक चेयर और एक टेबल। दीवार पर कुछ तस्वीरें लगी हैं। दोनों अध्ययन में लग जाते हैं। एक ही सप्ताह बाद एक्जाम है। एक्जाम होता है रिजल्ट भी आ जाता है। दोनों सफल हो जाते हैं।
रामदयाल के ग्रेजुएशन करते ही उसके पिता का देहान्त हो जाता है। इसे मात्र कुसंयोग कहा जा सकता है। परिवार की पूरी जिम्मेदारी उसके कंधों पर आ गयी। इसलिए वह आगे की पढ़ाई नहीं कर सका। अपने परिवार को सुचारू रूप से चलाने के लिए सर्विस की आवश्यकता हुई। उसने सर्विस के लिए अप्लाई किया। कुछ दिनों बाद एक्जाम होता है। वह एक्जाम देता है और रिजल्ट घोषित होता है जिसमें वह सफल हो जाता है।
अब बारी थी साक्षात्कार की। उसमें सफल हो जाने पर रामदयाल अपनी माँ और बहनों के लिए बहुत बड़ा सहारा बन जाता। साक्षात्कार का समय पास आ जाता है। वह तैयारियों में जुट गया है।
रामदयाल इण्टरव्यू देने जाता है। दस्तावेज की जांच-पड़ताल की जाती है। उसी समय क्लर्क रामदयाल से फुसफुसाता है कि दक्षिणा की व्यवस्था किया है। बिना उसके नौकरी मिलेगी नहीं। साहब बिना कुछ लिये करने वाले नहीं हैं। रामदयाल कुछ कहना चाह रहा था कि उसका नाम बुलाया गया साक्षात्कार कक्ष के लिए। वह गेट के सामने जाकर खड़ा हो जाता है। परमीशन पाकर अंदर जाता है। सामने दो व्यक्ति बैठे हैं। एक कुर्सी उसके लिए खाली पड़ी है।
एक व्यक्ति कहता है- आओ, अन्दर आओ।
जी, धन्यवाद आदरणीय। रामदयाल कहता है।
सामने से ‘बैठ जाओ’ की आवाज आई।
वह बैठ गया।
क्या नाम है? एक ने पूछा।
रामदयाल श्रीमान।
कहां तक शिक्षा प्राप्त की है?
ग्रेजुएशन किया है श्रीमान।
फिर रिकॉर्ड देखकर- हूं ऊ, मार्क्स अच्छे हैं पढ़ने में होशियार हो।
जी धन्यवाद, रामदयाल कहता है।
और भी कई प्रश्न पूछे जाते हैं जिनका उत्तर वह सही ढंग से देने की कोशिश करता है।
किसी से जान-पहचान है?
नहीं श्रीमान।
ठीक है जाओ। क्लर्क से मिल लेना।
रामदयाल बाहर आकर उस क्लर्क से मिला। उसे बताया गया कि दो लाख रुपए दक्षिणा के रूप में लगेंगे। नौकरी पक्की। कल तक लाकर गुप्त दान कर दो।
रामदयाल सोचता है कि हमारी व्यवस्था कितनी लचर और भ्रष्ट है कि किसी ईमानदार निर्धन व्यक्ति को नौकरी मिल पाना ‘मील का पत्थर’ है। रिश्वत का इतना ज्यादा बोलबाला है कि योग्यता एक कोने में दबी रह जाती है। आज के युग में जैसे पैसा ही सबकुछ हो गया है। यदि पैसा नहीं है तो अच्छी-खासी सिफारिश होनी चाहिए तभी नौकरी या कोई बड़ा काम सम्भव है।
रामदयाल कशमकश में पड़ जाता है। वह गरीब घराने से ताल्लुक रखता है। रिश्वत देने वाले व्यक्ति को उसी प्रकार कष्ट होता है जिस प्रकार किसी माँ से उसका पुत्र कुछ दिनों के लिए दूर कर दिया जाय। लेकिन हमारी व्यवस्था ऐसी बन गयी है कि हर हालात में उसे देना पड़ता है। रामदयाल भी इसी व्यवस्था का शिकार बनता है।
रामदयाल घर को लौट जाता है। वह मन ही मन कुण्ठित होता है। अपने भाग्य को कोसता है। बिना रिश्वत के दफ्तरों का पत्ता भी नहीं हिलता। दो लाख रुपए रिश्वत के लिए उसके पास नहीं हैं। पैसे नहीं दिये तो नौकरी हाथ से निकल जाएगी। मां है, बहनें हैं, उनकी जिम्मेदारी है।
यही सोचता हुआ घर वापस आ रहा था कि देखता है एक व्यक्ति बैंक से रुपए निकालकर ब्रीफकेस में रख रहा है। उसने सोचा कि यह रुपए उसे मिल जाएं तो उसे नौकरी मिल जाएगी। मगर मिले कैसे? उसे कोई रास्ता न सूझ रहा था। अंत में उसने तय किया कि वह इन पैसों को चुराएगा। कहते हैं कि जब बुरे दिन आते हैं तो विवेक अपना काम करना बंद कर देता है। व्यक्ति मुसीबतों के कुचक्र में फंसता चला जाता है। लाख कोशिशों के बावजूद भी इस कुचक्र से बाहर निकल पाना टेढ़ी खीर है। वह इसी कशमकश के बीच घुन की तरह पिसता रहता है। उसकी बुद्धि सबकुछ लुटा चुके मनुष्य की तरह निष्क्रिय हो बैठ जाती है।
रामदयाल अपना विचार दृढ़ कर उन रुपयों को चुराने की कोशिश करता है, किन्तु वह चालाक या शातिर चोर होता नहीं, इसलिए पकड़ा जाता है। वह सभ्य-शासन, घूसखोर व्यवस्था की जेब गरम करने के लिए चोरी करता है, लेकिन नाकामयाब।
यह ऐसी व्यवस्था है जिसमें योग्यता का कोई मूल्य नहीं रह जाता। हीनता बोध कराने वाला यह एक नायाब पुर्जा है। इस व्यवस्था में व्यक्ति का कहीं कोई स्थान नहीं, स्थान है तो सिर्फ एक चीज का वह है पैसा, रिश्वत। पुलिस से सैकड़ों लाठियाँ खानी पड़ी। उसे जेल में डाल दिया जाता है। पर क्यों? इस व्यवस्था में उसका क्या दोष है? यह प्रश्न अनुत्तरित नहीं है किन्तु उत्तर की तलाश में भटक अवश्य रहा है।
ग्राम पोस्ट-परासी, तहसील- मनगवां
जिला- रीवा, मध्य प्रदेश