भूमिसुता का मौन और प्रकृति का शोर
डॉ० राघवेन्द्र कुमार राघव– वन की वह संध्या अत्यन्त विलक्षण थी। आकाश पर धूसर मेघों की पतली परतें तैर रही थीं। सूर्य अस्ताचल की ओर झुक रहा था, पर उसकी लालिमा मानो धरती के हृदय […]
डॉ० राघवेन्द्र कुमार राघव– वन की वह संध्या अत्यन्त विलक्षण थी। आकाश पर धूसर मेघों की पतली परतें तैर रही थीं। सूर्य अस्ताचल की ओर झुक रहा था, पर उसकी लालिमा मानो धरती के हृदय […]
डॉ० राघवेन्द्र कुमार राघव– वन की ओर जाने वाले उस मार्ग पर सूर्य अस्ताचल की ओर झुक रहा था। रथ के पहियों से उठती धूल मानो अयोध्या की स्मृतियों को अपने साथ लिए चली जा […]